वेस्ट एशिया में जारी जियोपॉलिटिकल तनाव के कारण सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे भारतीय कंपनियों को अपना कामकाज चलाने के लिए भारी कर्ज लेना पड़ रहा है। इस मांग के चलते सितंबर तिमाही में कॉरपोरेट लोन की डिमांड में **20%** का जबरदस्त उछाल आया है, जिससे RBL, Axis और ICICI जैसे प्राइवेट बैंकों को मजबूती मिली है।
कॉर्पोरेट कर्ज क्यों बढ़ रहा है?
कंपनियां कच्चे माल, इन्वेंट्री और अन्य ऑपरेशनल खर्चों के लिए वर्किंग कैपिटल लोन पर निर्भर करती हैं। जब शिपिंग रूट में देरी होती है या ऑयल की कीमतें अस्थिर होती हैं, तो कंपनियों का 'कैश कन्वर्जन साइकिल' लंबा हो जाता है। माल ट्रांजिट में फंसने या इन्वेंट्री बढ़ने के कारण कंपनियों को नकदी की कमी पूरा करने के लिए क्रेडिट लाइनों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है, जो सीधे तौर पर बैंक क्रेडिट में बढ़ोतरी की मुख्य वजह है।
प्राइवेट बैंकों का दबदबा
इस रुझान का सीधा फायदा प्राइवेट सेक्टर के लेंडर्स को मिल रहा है। RBL Bank ने अपने कॉर्पोरेट लोन बुक में साल-दर-साल 58% की शानदार बढ़ोतरी दर्ज की है। वहीं, Axis Bank और ICICI Bank ने क्रमशः 34% और 30.6% की ग्रोथ दिखाई है। इसके अलावा Kotak Mahindra Bank, Federal Bank, HDFC Bank और IndusInd Bank ने भी होलसेल पोर्टफोलियो में डबल डिजिट ग्रोथ हासिल की है। यह उन बैंकों के लिए बड़ा बदलाव है जो पहले मुख्य रूप से रिटेल लेंडिंग पर फोकस करते थे।
निवेशकों को किन बातों पर नजर रखनी चाहिए?
भले ही लोन बुक में विस्तार बैंकों के लिए अच्छी खबर है, लेकिन निवेशकों को इसके छिपे जोखिमों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि जियोपॉलिटिकल संकट लंबा खिंचा, तो इन कंपनियों की कैश जनरेट करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है, जिससे बैंकों की एसेट क्वालिटी (Asset Quality) पर दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा, होलसेल बाजार में हिस्सा लेने के लिए बैंकों को प्रतिस्पर्धी दरों पर लोन देना पड़ सकता है, जो उनके प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित कर सकता है। निवेशकों को आने वाली तिमाहियों में लोन बुक की क्वालिटी और मैनेजमेंट की कमेंट्री पर पैनी नजर रखनी चाहिए।
