भगोड़े बिजनेसमैन Vijay Mallya ने भारत की कर्ज वसूली (Debt Recovery) की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने Subhash Chandra के हालिया NCLT-अप्रूव्ड सेटलमेंट का हवाला देते हुए दावा किया कि उनकी संपत्तियों से हुई वसूली उनके कुल कर्ज से कहीं अधिक है।
दोहरे मापदंडों का आरोप
विजय माल्या ने देश की कर्ज वसूली प्रणाली की पारदर्शिता पर तीखे सवाल उठाए हैं। उन्होंने ज़ी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा के हालिया इन्सॉल्वेंसी सेटलमेंट और अपने केस के बीच के अंतर को लेकर सिस्टम पर भेदभाव का आरोप लगाया है। माल्या का तर्क है कि अलग-अलग मामलों में कर्ज सेटलमेंट के तरीकों में जो भारी अंतर दिख रहा है, उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
NCLT का सेटलमेंट और विवाद
विवाद की शुरुआत नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) द्वारा सुभाष चंद्रा के पर्सनल इन्सॉल्वेंसी प्लान को मंजूरी मिलने से हुई। इस समझौते में कर्जदाताओं ने कुल दावों की तुलना में काफी कम रकम वसूलने पर सहमति जताई। सुभाष चंद्रा ने स्पष्ट किया है कि जिन ऊंचे दावों की बात हो रही है, वे एस्सेल ग्रुप की संस्थाओं के लिए पर्सनल गारंटर के रूप में थे, न कि सीधे पर्सनल लोन, और वास्तविक विवादित कर्ज अनुमानों से काफी कम था।
माल्या के आंकड़े और मांग
वहीं, विजय माल्या ने दावा किया है कि सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, उनकी संपत्तियों से ₹14,100 करोड़ की वसूली हो चुकी है। उनका तर्क है कि यह राशि उनके ₹6,203 करोड़ के कुल कर्ज से कहीं ज्यादा है। माल्या ने बार-बार मांग की है कि उनकी देनदारियों के खिलाफ जो वसूली हुई है, उसका विस्तृत ब्यौरा (Itemized Reconciliation) सार्वजनिक किया जाए।
मार्केट और IBC पर असर
इन्वेस्टर्स और बाजार के लिए यह बहस 'इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड' (IBC) की पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल उठाती है। जब कर्जदाता कर्ज के मूल रूप में बड़ी कटौती (Haircut) पर सहमत होते हैं, तो इसका सीधा असर पब्लिक सेक्टर बैंकों की बैलेंस शीट पर पड़ता है। बाजार की नजर अब इस पर है कि क्या नियामक या न्यायिक अधिकारी माल्या के दावों पर कोई स्पष्टीकरण देते हैं और सुभाष चंद्रा का मामला भविष्य के लिए क्या नजीर पेश करता है।
