दिग्गज निवेशक विजय केडिया ने Zaggle Prepaid Ocean Services के 20 लाख शेयर खरीदे हैं। यह खरीदारी ऐसे समय में हुई है जब कंपनी रेवेन्यू में मजबूत ग्रोथ के बावजूद प्रॉफिट (Profit) के दबाव का सामना कर रही है। यह कदम कंपनी के ट्रांसफॉर्मेशन फेज पर एक बड़ा दांव माना जा रहा है।
विजय केडिया का बड़ा दांव: 20 लाख शेयर खरीदे
दिग्गज निवेशक विजय केडिया की फर्म Kedia Securities ने नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) पर बल्क डील के जरिए Zaggle Prepaid Ocean Services के 20 लाख शेयर खरीदे हैं। यह डील ₹32.94 करोड़ की थी, जिससे कंपनी में उनकी हिस्सेदारी बढ़कर 1.48% हो गई है। यह निवेश ऐसे समय में आया है जब स्टॉक ने इसी दिन ₹154.40 का 52-हफ्ते का निचला स्तर छुआ था, जो कि पिछले उच्चतम स्तरों से काफी बड़ी गिरावट थी।
रेवेन्यू में ग्रोथ, पर प्रॉफिट पर दबाव
Zaggle के हालिया फाइनेंशियल नतीजों पर नजर डालें तो तस्वीर मिली-जुली दिखती है। फाइनेंशियल ईयर 2027 की पहली तिमाही में, कंपनी का रेवेन्यू पिछले साल की तुलना में 28% बढ़कर ₹423 करोड़ हो गया। हालांकि, इस ग्रोथ की कीमत कंपनी को अपने प्रॉफिट (Profit) के रूप में चुकानी पड़ी है। कंपनी का नेट प्रॉफिट 33% घटकर ₹17.5 करोड़ रह गया। इसका मुख्य कारण कर्मचारी लागत, टेक्नोलॉजी में भारी निवेश और हाल ही में अधिग्रहीत DICE प्लेटफॉर्म को इंटीग्रेट करने का बढ़ता खर्च है।
मार्जिन पर असर और मार्केट का रिएक्शन
बढ़ते खर्चों के चलते कंपनी के EBITDA मार्जिन में 190 बेसिस पॉइंट की गिरावट आई है, जो पिछले साल की पहली तिमाही के 10.1% से घटकर 8.2% हो गया है। जहां एक ओर रेवेन्यू बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर कंपनी भारी निवेश और कंसॉलिडेशन के दौर से गुजर रही है, जिससे फिलहाल प्रॉफिट कम हो रहा है।
केडिया की हिस्सेदारी खरीदने की खबर के बाद, स्टॉक में सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली है। पिछले तीन ट्रेडिंग सेशन में शेयर में लगभग 17% का उछाल आया है। यह तब और भी महत्वपूर्ण है जब स्टॉक पहले से ही बड़े मूविंग एवरेज से नीचे ट्रेड कर रहा था और तकनीकी रूप से दबाव में था।
आगे की राह
कंपनी का मैनेजमेंट इस समय को एक महत्वपूर्ण मोड़ बता रहा है, जहां से कंपनी तेजी से विस्तार के फेज से निकलकर कंसॉलिडेशन और इंटीग्रेशन पर फोकस करेगी। निवेशकों के लिए यह देखना अहम होगा कि कंपनी अपने अधिग्रहण से जुड़े खर्चों को झेलते हुए मार्जिन को कैसे स्थिर करती है। आने वाली तिमाहियों में यह भी देखना होगा कि रेवेन्यू ग्रोथ, इंटीग्रेशन के बढ़ते खर्चों से आगे निकल पाती है या नहीं। कंपनी का लॉन्ग-टर्म परफॉर्मेंस इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अपने प्लेटफॉर्म के विस्तार को बेहतर प्रॉफिटेबिलिटी में कैसे बदल पाती है।
