Venture Capitalists (VCs) अब UPI AutoPay के आंकड़ों की गहराई से जांच कर रहे हैं। जुलाई 2026 में e-mandate ट्रांजैक्शन बढ़कर **1.8 अरब** पहुंच गए हैं, लेकिन निवेशकों को डर है कि इसमें बड़ी संख्या में ऐसे 'डेड यूजर्स' हैं जो सेवा का इस्तेमाल नहीं कर रहे, फिर भी पैसे कट रहे हैं।
'डेड यूजर्स' का खेल
भारत में डिजिटल पेमेंट्स की रफ्तार तेज है, लेकिन फंडरेजिंग बोर्डरूम्स में अब घमासान मच गया है। वेंचर कैपिटल फर्में अब सिर्फ 'रिकरिंग रेवेन्यू' (Recurring Revenue) देखकर पैसा नहीं लगा रहीं। वे इस बात की जांच कर रही हैं कि क्या सब्सक्राइबर्स सच में सर्विस का इस्तेमाल कर रहे हैं, या वे बस उन 'डेड यूजर्स' की लिस्ट में हैं जिन्होंने महीनों पहले सर्विस छोड़ दी थी, लेकिन उनका AutoPay अभी भी एक्टिव है।
आंकड़ों की सच्चाई
National Payments Corporation of India (NPCI) के डेटा के मुताबिक, जुलाई 2026 में टॉप 10 बैंकों ने करीब 1.8 अरब UPI e-mandate ट्रांजैक्शन प्रोसेस किए, जो जुलाई 2025 के 58.5 करोड़ के मुकाबले बहुत ज्यादा है। हालांकि, यह ग्रोथ कागजों पर शानदार दिखती है, लेकिन निवेशकों को चिंता है कि यह कमाई कितनी टिकाऊ है। अगर रेवेन्यू उन लोगों से आ रहा है जो सब्सक्रिप्शन कैंसिल करना भूल गए हैं, तो यह कभी भी अचानक गिर सकता है।
IPO और वैल्यूएशन का रिस्क
स्टार्टअप्स अक्सर IPO या फंडिंग राउंड्स के दौरान अपने AutoPay मैंडेट्स की संख्या दिखाकर निवेशकों को लुभाते हैं। लेकिन अब निवेशक इसे 'इनफ्लेटेड रेवेन्यू' (Inflated Revenue) मान रहे हैं। कई मामलों में तो इसे लेकर स्टार्टअप्स और इन्वेस्टर्स के बीच विवाद भी देखने को मिला है। अब निवेशक कंपनी की असली सेहत जांचने के लिए 'Active Usage' और 'Recurring Payment' का बारीक ब्रेकडाउन मांग रहे हैं।
रेगुलेटरी दबाव की आहट
RBI और NPCI लगातार कंज्यूमर प्रोटेक्शन पर नजर बनाए हुए हैं। दुनिया भर में 'Click-to-cancel' जैसे सख्त नियम लागू हो रहे हैं, जिससे सब्सक्रिप्शन को हटाना आसान हो जाए। अगर भारत में भी ऐसे सख्त नियम आते हैं, तो उन कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है जो सिर्फ निष्क्रिय ग्राहकों के भरोसे टिकी हैं। अब वही स्टार्टअप्स आगे बढ़ेंगे जो ग्राहकों का भरोसा जीत पाएंगे और जिनका रेवेन्यू असली यूजर एंगेजमेंट (Engagement Metrics) से जुड़ा होगा।
