हेल्थ इंश्योरेंस के 'Unlimited Sum Insured' (USI) प्लान्स की मांग तेजी से बढ़ी है। FY25 में जहां इनका मार्केट शेयर सिर्फ 0.05% था, वहीं FY27 में यह बढ़कर 15% के पार पहुंच गया है। मेडिकल महंगाई इसका मुख्य कारण है।
क्या हुआ है?
'Unlimited Sum Insured' (USI) वाले हेल्थ इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स, जो कभी एक खास वर्ग के लिए थे, अब भारत में मेनस्ट्रीम बन गए हैं। हालिया मार्केट डेटा के अनुसार, इन प्लान्स का मार्केट शेयर FY25 में महज 0.05% से बढ़कर FY27 में 15% से अधिक हो गया है। FY27 में 108.9% की सालाना ग्रोथ, भारतीय ग्राहकों के लिए एक बड़े बदलाव का संकेत है, खासकर युवा वर्ग और टियर-2 व टियर-3 शहरों में रहने वाले लोग, जो बढ़ते हेल्थकेयर खर्चों से सुरक्षा चाहते हैं।
मेडिकल महंगाई का असर
इन प्लान्स की बढ़ती डिमांड की सबसे बड़ी वजह मेडिकल महंगाई का तेजी से बढ़ना है, जो सामान्य कंज्यूमर प्राइस इन्फ्लेशन से कहीं ज्यादा है। जहां आम महंगाई धीमी गति से बढ़ रही है, वहीं हेल्थकेयर के खर्चे—जैसे हॉस्पिटल स्टे, एडवांस्ड डायग्नोस्टिक्स और स्पेशलाइज्ड ट्रीटमेंट्स—2026 में सालाना 11% से 14% तक बढ़ रहे हैं। इस स्थिति के साथ-साथ, युवा वर्ग में लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों के बढ़ते मामलों ने पारंपरिक, फिक्स्ड-कवर पॉलिसियों को कई खरीदारों के लिए अपर्याप्त बना दिया है।
कौन और कहां से खरीद रहे हैं?
USI प्लान्स का इस्तेमाल अब सिर्फ मेट्रो शहरों तक सीमित नहीं है। FY27 में, टियर-3 शहरों से 41% से अधिक मार्केट शेयर आया, जबकि टियर-2 शहरों की हिस्सेदारी 25% रही। यह भौगोलिक विस्तार बेहतर डिजिटल पहुंच और बड़े शहरों के बाहर भी हॉस्पिटलाइजेशन के खर्चों के प्रति बढ़ती जागरूकता को दर्शाता है। डेमोग्राफिक्स की बात करें तो, मिलेनियल्स (Millennials) अब भी सबसे बड़ा सेगमेंट हैं, जो लगभग 57% खरीदार बनाते हैं। हालांकि, Gen Z का दखल भी तेजी से बढ़ रहा है, जो अब कुल खरीदारियों का 30% से अधिक हो गया है। दिलचस्प बात यह है कि नॉन-रेजिडेंट इंडियंस (NRIs) भी इन प्लान्स की ओर रुख कर रहे हैं, जिनका इस्तेमाल FY25 में लगभग शून्य से बढ़कर FY27 में 36% तक पहुंच गया है, अक्सर भारत में परिवार के सदस्यों की सुरक्षा के लिए।
'Unlimited' का असली मतलब समझें
हालांकि मार्केटिंग 'अनलिमिटेड' कवरेज पर जोर देती है, पॉलिसीधारकों के लिए यह समझना ज़रूरी है कि ये प्रोडक्ट्स असल में कैसे काम करते हैं। कई मामलों में, ये प्लान्स शुरू से ही एक असीमित राशि का वादा नहीं करते। इसके बजाय, वे अक्सर 'रेस्टोरेशन' या 'रीचार्ज' बेनिफिट्स पर निर्भर करते हैं। इसका मतलब है कि एक बार किसी हॉस्पिटलाइजेशन के दौरान मूल सम एश्योर्ड (Sum Insured) खत्म हो जाता है, तो इंश्योरर अगली क्लेम्स के लिए उस राशि को फिर से भर देता है।
खरीदारों को सामान्य एक्सक्लूजन (exclusions) और शर्तों पर भी ध्यान देना चाहिए। व्यापक प्लान्स में भी, इंश्योरर अक्सर सब-लिमिट्स लगाते हैं, जैसे रूम रेंट या कुछ खास मेडिकल प्रोसीजर्स पर कैप। इसके अलावा, मैंडेटरी को-पेमेंट क्लॉज—जहां पॉलिसीधारक बिल का एक प्रतिशत भुगतान करता है—कुल सम एश्योर्ड की परवाह किए बिना लागू हो सकते हैं। इन कारकों का मतलब है कि जबकि पॉलिसी कवर खत्म न होने के जोखिम को कम करती है, यह पूरी तरह से आउट-ऑफ-पॉकेट खर्चों को खत्म नहीं करती है।
बिज़नेस और फाइनेंशियल परिप्रेक्ष्य
इंश्योरेंस कंपनियों के लिए, USI प्लान्स का उदय एक अवसर और चुनौती दोनों पेश करता है। बिक्री की मात्रा बढ़ने से प्रीमियम कलेक्शन बढ़ता है, लेकिन इन प्लान्स में अंडरराइटिंग का जोखिम भी अधिक होता है। चूंकि कुछ खास बीमारियों के लिए क्लेम की कोई ऊपरी सीमा नहीं होती, इंश्योरर्स को इन पॉलिसियों की कीमत तय करने के लिए सटीक एक्चुएरियल डेटा पर निर्भर रहना पड़ता है। यदि क्लेम की संख्या—खासकर हाई-कॉस्ट ट्रीटमेंट्स के लिए—अनुमानों से अधिक हो जाती है, तो इंश्योरर्स को भविष्य में प्रीमियम में काफी बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है। इन प्रोडक्ट्स की स्थिरता क्लेम की फ्रीक्वेंसी और इस्तेमाल किए जाने वाले प्रीमियम प्राइसिंग मॉडल्स के बीच संतुलन बनाए रखने पर निर्भर करती है।
निवेशकों को क्या ध्यान देना चाहिए?
इंश्योरेंस सेक्टर की निगरानी करने वाले निवेशकों और मार्केट ऑब्जर्वर्स के लिए कुछ मुख्य संकेतकों पर नज़र रखना महत्वपूर्ण होगा। पहला, हेल्थ इंश्योरर्स के लिए 'इनकर्ड क्लेम रेशियो' (ICR) में होने वाला बदलाव अहम है, क्योंकि यह बताता है कि प्रीमियम का कितना हिस्सा क्लेम्स के रूप में भुगतान किया जा रहा है। दूसरा, लिस्टेड इंश्योरेंस कंपनियों के मैनेजमेंट कमेंट्री से यह insight मिलेगी कि वे इन जोखिमों की कीमत कैसे लगा रहे हैं। अंत में, पॉलिसी डिस्क्लोजर में पारदर्शिता और प्रीमियम रिवीजन को लेकर इंश्योरेंस अथॉरिटी से कोई भी रेगुलेटरी अपडेट महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि ये ग्राहकों के लिए अफोर्डेबिलिटी और इंश्योरर के मुनाफे, दोनों को प्रभावित करते हैं।
