UTI Asset Management Company के CEO Vetri Subramaniam ने निवेशकों को सलाह दी है कि वे अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी को देखकर भारतीय बाजार से बाहर न निकलें। उन्होंने ग्लोबल अस्थिरता के बजाय घरेलू अर्निंग्स ग्रोथ पर ध्यान देने और स्मॉल-कैप व मिड-कैप में ज्यादा एक्सपोजर से बचने की चेतावनी दी है।
ग्लोबल मार्केट में बढ़ती ब्याज दरों का असर अब भारतीय निवेशकों की चिंता का विषय बन गया है, खासकर तब जब 30-वर्षीय US ट्रेजरी यील्ड का स्तर 5% के पार निकल गया है। अक्सर इसे इमर्जिंग मार्केट्स से पैसा निकालने का एक संकेत माना जाता है, लेकिन UTI AMC के MD और CEO Vetri Subramaniam का मानना है कि भारतीय निवेशकों को बाहरी दबाव के बजाय देश के मजबूत फंडामेंटल्स पर ध्यान देना चाहिए।
क्यों सुरक्षित है भारतीय बाजार?
Subramaniam के मुताबिक, कॉर्पोरेट की दमदार कमाई और मैक्रो-इकोनॉमिक स्टेबिलिटी भारतीय अर्थव्यवस्था को सुरक्षा कवच प्रदान करती है। जब कोई देश वित्तीय अनुशासन (Fiscal Discipline) बनाए रखता है और लगातार कैश फ्लो दिखाता है, तो वह ग्लोबल वोलैटिलिटी को झेलने में सक्षम होता है।
वैल्युएशन का गणित और चेतावनी
रिटेल निवेशकों के लिए एक बड़ा रिस्क फैक्टर बाजार के अलग-अलग हिस्सों में दिख रहा वैल्युएशन गैप है। जहां लार्ज-कैप कंपनियां फिलहाल ऐतिहासिक औसत के हिसाब से सही भाव पर हैं, वहीं स्मॉल-कैप और मिड-कैप स्टॉक्स काफी महंगे हो चुके हैं। यह गैप इशारा करता है कि छोटी कंपनियों में आई तेजी हमेशा कमाई (Earnings) के दम पर नहीं है, जो निवेशकों के लिए जोखिम बढ़ा सकती है।
SIP और पोर्टफोलियो री-बैलेंसिंग
सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) में रिकॉर्ड पैसा आ रहा है, जो रिटेल भागीदारी का बड़ा सबूत है। हालांकि, केवल SIP करना ही बाजार के करेक्शन से बचने का 'जादुई ढाल' नहीं है। निवेशकों को समय-समय पर अपने पोर्टफोलियो को री-बैलेंस (Rebalance) करना बेहद जरूरी है।
आगे की राह
आने वाली तिमाहियों में कंपनियों की कमाई में निरंतरता (Consistency) ही बाजार की सेहत तय करेगी। चूंकि घरेलू रिटेल निवेश विदेशी पूंजी की निकासी के मुकाबले एक मजबूत सहारा बनकर उभरा है, इसलिए अब निवेशकों की नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या स्मॉल और मिड-कैप कंपनियां अपने मुनाफे के जरिए मौजूदा ऊंचे वैल्युएशन को जस्टिफाई कर पाएंगी या नहीं।
