US 10-year Treasury यील्ड **5.3%** के करीब है। कई निवेशक रुपये में गिरावट को जोड़कर **8%** रिटर्न का सपना देख रहे हैं, लेकिन करेंसी में उतार-चढ़ाव और बॉन्ड कीमतों में रिस्क इसे जोखिम भरा बना सकता है।
US 10-year Treasury यील्ड अभी 5.3% के आसपास ट्रेड कर रही है, जो 2002 के बाद का उच्चतम स्तर है। कई भारतीय निवेशक इसे एक बेहतरीन निवेश मान रहे हैं। तर्क यह दिया जा रहा है कि अगर 5.3% की यील्ड के साथ रुपये की सालाना ऐतिहासिक गिरावट (लगभग 3%) को जोड़ दिया जाए, तो रिटर्न 8% तक पहुंच सकता है। लेकिन इसे एक सुरक्षित फिक्स्ड इनकम रणनीति समझना एक बड़ी भूल हो सकती है।
रिटर्न का गणित और जोखिम
8% रिटर्न का पूरा गणित दो चीजों पर टिका है: बॉन्ड से मिलने वाला ब्याज और डॉलर के मुकाबले रुपये में आने वाली गिरावट। यह ध्यान रखना जरूरी है कि रुपया हर साल डॉलर के मुकाबले कम हो, यह जरूरी नहीं है। अगर रुपया स्थिर रहता है या मजबूत होता है, तो आपका रिटर्न 5.3% के बेस यील्ड से भी नीचे जा सकता है। यह निवेश अब एक फिक्स्ड इनकम की तरह नहीं, बल्कि करेंसी बेट की तरह काम करेगा।
बॉन्ड की कीमतों का खेल
निवेशक अक्सर यह भूल जाते हैं कि बॉन्ड की कीमतों और यील्ड में उल्टा संबंध होता है। अगर US में ब्याज दरें और बढ़ती हैं, तो मौजूदा बॉन्ड्स की मार्केट वैल्यू गिर सकती है। ऐसे में अगर आप मैच्योरिटी से पहले बॉन्ड बेचते हैं, तो आपको कैपिटल लॉस हो सकता है, जो आपकी पूरी कमाई को धो सकता है।
टैक्स और अन्य रुकावटें
भारतीय निवेशक इसे LRS (Liberalised Remittance Scheme), GIFT City, या US Treasury ETFs के जरिए एक्सेस करते हैं। इसमें TCS का प्रभाव और एडमिनिस्ट्रेटिव मुश्किलें भी होती हैं। सबसे अहम है टैक्स—US बॉन्ड से होने वाली कमाई आपके टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्सेबल होती है। जब आप इसमें टैक्स और रेमिटेंस फीस घटाते हैं, तो 8% का लक्ष्य पाना काफी मुश्किल हो जाता है।
फाइनेंशियल प्लानर्स का मानना है कि इसे केवल 'रिटर्न' के लिए नहीं, बल्कि करेंसी डाइवर्सिफिकेशन के लिए इस्तेमाल करना चाहिए।
