U.S. Bond Yields का 24 साल का उच्चतम स्तर: क्या भारतीय बाजार में आने वाला है बड़ा झटका?

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AuthorAditya Rao|Published at:
U.S. Bond Yields का 24 साल का उच्चतम स्तर: क्या भारतीय बाजार में आने वाला है बड़ा झटका?

U.S. 10-year Treasury yield बढ़कर **5.36%** पर पहुंच गया है, जो पिछले **24** सालों का रिकॉर्ड स्तर है। इस वैश्विक हलचल के कारण भारतीय शेयर बाजार में FIIs की बिकवाली बढ़ गई है और निवेशकों को अब अपनी रणनीति बदलने की जरूरत है।

ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट्स में ब्याज दरों को लेकर बड़ी हलचल मची हुई है। अक्टूबर की शुरुआत में U.S. 10-year Treasury yield 5.36% पर पहुंच गई, जो पिछले 24 सालों का सबसे ऊंचा स्तर है। इसका सीधा असर भारतीय शेयर बाजार पर पड़ रहा है। जब U.S. गवर्नमेंट बॉन्ड्स सुरक्षित और बेहतर रिटर्न देने लगते हैं, तो विदेशी निवेशक भारत जैसे उभरते बाजारों से पैसा निकालकर वहां लगाने लगते हैं।

FIIs की बिकवाली और बाजार पर दबाव

सितंबर 2026 में Foreign Institutional Investors (FIIs) ने भारतीय इक्विटी बाजार से लगभग ₹45,000 करोड़ की भारी बिकवाली की है। इस दबाव के चलते Nifty 50 इंडेक्स को लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। बॉन्ड यील्ड का बढ़ना शेयरों के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि निवेशकों को अब सुरक्षित सरकारी डेट (Debt) में बेहतर रिटर्न मिल रहा है, जिससे उन कंपनियों के वैल्यूएशन पर असर पड़ रहा है जो उम्मीद के मुताबिक ग्रोथ नहीं दिखा पा रही हैं।

क्यों बढ़ रहा है कर्ज का बोझ?

यील्ड में इस उछाल के पीछे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सेक्टर में हो रहा भारी निवेश है। कंपनियां AI इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने के लिए जमकर कर्ज ले रही हैं। अनुमान है कि इस साल करीब $570 बिलियन का नया कर्ज जारी किया गया है। ग्लोबल डेट का स्तर $365 ट्रिलियन के पार निकल चुका है, जिसमें U.S. सरकारी कर्ज का हिस्सा $40 ट्रिलियन है। भारत में भी बैंकिंग और रियल एस्टेट जैसे रेट-सेंसिटिव सेक्टर पर इसका असर पड़ सकता है, जिससे कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन घटने का खतरा है।

निवेश की बदलती रणनीति

मार्केट एक्सपर्ट्स अब अपने पोर्टफोलियो को रीबैलेंस करने की सलाह दे रहे हैं। शॉर्ट-ड्यूरेशन बॉन्ड्स (1 से 5 साल की अवधि) को प्राथमिकता दी जा रही है। साथ ही, निवेशक 'टैक्स-लॉस हार्वेस्टिंग' का सहारा ले रहे हैं ताकि कैपिटल गेन को मैनेज किया जा सके। मौजूदा समय में छोटे और रिस्की शेयरों के बजाय मजबूत कैश फ्लो वाली बड़ी कंपनियों (Large-cap) में बने रहना ही समझदारी है।

अगले कुछ हफ़्तों में Reserve Bank of India का रुख और विदेशी फंड का फ्लो भारतीय बाजार की दिशा तय करेगा। निवेशकों के लिए कॉर्पोरेट नतीजों पर नजर रखना बेहद जरूरी है कि क्या कंपनियां इस बढ़ते ब्याज दर के माहौल में अपने प्रॉफिट मार्जिन को बचा पाएंगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.