सरकार ने Payment and Settlement Systems Act, 2026 में संशोधन कर दिया है, जिससे अब चुनिंदा हाई-वैल्यू UPI ट्रांजैक्शंस पर मर्चेंट फीस लगाने का कानूनी रास्ता साफ हो गया है। आम यूजर्स और छोटे दुकानदारों के लिए UPI पहले की तरह फ्री रहेगा।
भारतीय सरकार ने डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम को सस्टेनेबल बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। अगस्त में 'Taxation and Other Laws (Amendment) Bill, 2026' के पास होने के बाद, अब UPI ट्रांजैक्शंस पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने का कानूनी ढांचा तैयार हो गया है। यह उस 'जीरो-फी' मॉडल से एक बड़ा बदलाव है, जिसने अब तक UPI की लोकप्रियता में अहम भूमिका निभाई थी।
क्यों लिया गया यह फैसला?
हर साल होने वाले 24,000 करोड़ से ज्यादा ट्रांजैक्शंस के लिए एक सुरक्षित और हाई-स्पीड पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को मेंटेन करने का खर्च लगातार बढ़ रहा है। सरकार का मानना है कि साइबर सिक्योरिटी और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए अब एक सस्टेनेबल फाइनेंशियल मॉडल की जरूरत है।
क्या आम ग्राहकों पर पड़ेगा असर?
यह समझना जरूरी है कि यह कोई 'UPI टैक्स' नहीं है। पर्सन-टू-पर्सन (P2P) ट्रांसफर और छोटे दुकानदारों को की जाने वाली पेमेंट्स पहले की तरह पूरी तरह फ्री रहेंगी। इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि यह फीस केवल चुनिंदा बड़े मर्चेंट ट्रांजैक्शंस पर लग सकती है, जिसकी सीमा ₹2,000 से ऊपर हो सकती है। हालांकि, इसकी अंतिम रूपरेखा (फीस की दर और ट्रांजैक्शन लिमिट) NPCI की अगुवाई वाली 'UPI and Services Steering Committee' द्वारा तय की जाएगी। अभी तक कोई आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी नहीं हुआ है, इसलिए फिलहाल पुरानी व्यवस्था ही लागू है।
निवेशकों और फिनटेक कंपनियों के लिए क्या हैं रिस्क?
यह कदम पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए तो फायदेमंद हो सकता है, लेकिन इसमें चुनौतियां भी कम नहीं हैं। यदि फीस का स्ट्रक्चर बहुत ज्यादा रखा जाता है, तो दुकानदार डिजिटल पेमेंट से दूरी बना सकते हैं या ग्राहकों से वसूली के लिए कीमतों में इजाफा कर सकते हैं। आने वाले समय में बैंकों और फिनटेक एग्रीगेटर्स के बीच रेवेन्यू-शेयरिंग मॉडल पूरी तरह बदल सकते हैं। निवेशकों को अब NPCI के उन गाइडलाइंस का इंतजार है, जिनसे यह साफ होगा कि इसका असर डिजिटल ट्रांजैक्शन वॉल्यूम पर क्या होगा।
