UPI ट्रांजैक्शन पर MDR की वापसी? भारत सरकार ने बदला कानून, अब बड़े लेनदेन पर लग सकती है फीस

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
UPI ट्रांजैक्शन पर MDR की वापसी? भारत सरकार ने बदला कानून, अब बड़े लेनदेन पर लग सकती है फीस

भारत सरकार ने पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 में बदलाव कर दिया है। इस बदलाव से UPI पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि, सरकार ने साफ किया है कि आम ग्राहकों और पर्सनल ट्रांजैक्शन के लिए UPI हमेशा की तरह फ्री रहेगा। अब निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी होगी कि भविष्य में बड़े मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर लगने वाली फीस पेमेंट एग्रीगेटर्स और छोटे व्यवसायों के रेवेन्यू मॉडल को कैसे प्रभावित करेगी।

डिजिटल पेमेंट्स के नियमों में बड़ा बदलाव

भारत में डिजिटल पेमेंट्स के रेगुलेटरी माहौल में एक अहम बदलाव आया है। हाल ही में पास हुए टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) बिल, 2026 के ज़रिए पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 की धारा 10A में संशोधन किया गया है। इस बदलाव से UPI ट्रांजैक्शन्स पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) चार्ज करने की कानूनी रोक हट गई है।

हालांकि, यह संशोधन तुरंत फीस लागू नहीं करता है। सरकार ने पहले ही साफ कर दिया है कि आम ग्राहकों के लिए UPI हमेशा फ्री रहेगा और पर्सन-टू-पर्सन (P2P) मनी ट्रांसफर पर कोई शुल्क नहीं लगेगा।

निवेशकों और बाज़ार के लिए क्या है मायने?

अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि इस नए नियम को कैसे लागू किया जाएगा। इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि भविष्य में जो MDR लगाया जाएगा, वह थ्रेशोल्ड-बेस्ड होगा। इसका मतलब है कि यह छोटे, रोजमर्रा के भुगतानों के बजाय सिर्फ बड़े वैल्यू वाले मर्चेंट ट्रांजैक्शन्स पर ही लागू हो सकता है। चूंकि अभी तक फीस की सटीक प्रतिशत, ट्रांजैक्शन की लिमिट और रेवेन्यू शेयरिंग के तरीके तय नहीं हुए हैं, इसलिए बिज़नेस अभी पॉलिसी को लेकर अनिश्चितता के दौर में हैं।

विभिन्न सेक्टर्स पर क्या होगा असर?

  • बैंकों के लिए खुशखबरी: बैंकों के लिए MDR की संभावित वापसी एक सकारात्मक संकेत है। ऐतिहासिक रूप से, बैंक UPI ट्रांजैक्शन्स को प्रोसेस करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर, साइबर सिक्योरिटी और ऑपरेशनल लागतें उठाते रहे हैं, लेकिन उन्हें सीधा कोई फायदा नहीं होता था। एक फीस-आधारित मॉडल बैंकों के लिए आय का एक नया स्रोत खोल सकता है, जिससे पेमेंट नेटवर्क की इकोनॉमिक्स सुधर सकती है।
  • पेमेंट एग्रीगेटर्स और छोटे व्यापारियों पर दबाव: दूसरी ओर, पेमेंट एग्रीगेटर्स और मध्यम आकार के व्यापारियों को मार्जिन पर दबाव का सामना करना पड़ सकता है। कई ऑनलाइन व्यापारी पहले से ही कम मुनाफे पर काम कर रहे हैं और अपने ट्रांजैक्शन्स को मैनेज करने के लिए पेमेंट एग्रीगेटर्स का इस्तेमाल करते हैं। यदि एग्रीगेटर्स पर नए खर्चे आते हैं जिन्हें वे वहन नहीं कर सकते, तो उन्हें या तो अपनी सर्विस फीस बढ़ानी पड़ सकती है या यह लागत व्यापारियों पर डालनी पड़ सकती है। कॉम्पिटिटिव मार्केट में, जहां मर्चेंट्स को आकर्षित करने के लिए प्राइसिंग एक अहम टूल है, फिनटेक कंपनियों के लिए इन नए खर्चों को अपनी प्रॉफिटेबिलिटी या मार्केट शेयर को प्रभावित किए बिना बैलेंस करना एक चुनौती हो सकती है।

आगे क्या?

निवेशकों के लिए अगला महत्वपूर्ण कदम नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) और सरकार से लागू होने वाले नियमों के बारे में आधिकारिक सूचनाओं पर नजर रखना होगा। जब तक 'हाई-वैल्यू' ट्रांजैक्शन्स की सीमा और वास्तविक फीस स्ट्रक्चर फाइनल नहीं हो जाते, तब तक पेमेंट एग्रीगेटर्स और ई-कॉमर्स सेक्टर पर इसका पूरा वित्तीय प्रभाव केवल अनुमान ही रहेगा। बाज़ार के जानकार इस बात पर गौर करेंगे कि पेमेंट वैल्यू चेन में लागत का बोझ कैसे वितरित किया जाता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.