अगस्त 2026 में UPI ट्रांजेक्शन ने **24.51 अरब** का ऐतिहासिक आंकड़ा छू लिया है, जो कुल रिटेल पेमेंट का **77.3%** है। फिजिकल कार्ड्स के गिरते उपयोग के बीच बैंकों और फिनटेक कंपनियों के सामने रेवेन्यू मॉडल को बदलने की बड़ी चुनौती है।
भारत के पेमेंट सेक्टर में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। अगस्त 2026 में UPI ने 24.51 अरब ट्रांजेक्शन के साथ एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। कुल ट्रांजेक्शन वैल्यू ₹29.82 लाख करोड़ पहुंच गई है, जिससे यह साफ है कि आम भारतीय अब रोजमर्रा के खर्चों के लिए UPI पर पूरी तरह निर्भर हो गया है।
कार्ड्स की घटती चमक
जुलाई 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, मर्चेंट पेमेंट में UPI की हिस्सेदारी बढ़कर 77.3% हो गई है। दूसरी ओर, फिजिकल डेबिट कार्ड्स अब दुकानों पर गायब होते दिख रहे हैं, जिनकी हिस्सेदारी गिरकर महज 3.2% रह गई है। QR कोड की स्पीड ने प्लास्टिक कार्ड्स की जरूरत को लगभग खत्म कर दिया है।
क्रेडिट कार्ड्स की नई रणनीति
हालांकि क्रेडिट कार्ड्स अभी भी हाई-वैल्यू शॉपिंग और ई-कॉमर्स में अपनी जगह बनाए हुए हैं, लेकिन इनकी हिस्सेदारी भी गिरकर 17.7% पर आ गई है। अब बैंक 'RuPay' क्रेडिट कार्ड्स को UPI से जोड़कर इसे QR इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए भुनाने की कोशिश कर रहे हैं।
निवेशकों के लिए चिंता का सबब (Revenue Impact)
निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती 'MDR' (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) है। पुराने कार्ड सिस्टम में बैंकों को ट्रांजेक्शन पर अच्छा कमीशन मिलता था, लेकिन UPI के ज्यादातर छोटे ट्रांजेक्शन फ्री होते हैं, जिससे बैंकों और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए फीस से होने वाली कमाई कम हो गई है।
'Credit-on-UPI' के जरिए बैंक फिर से MDR को वापस लाने की फिराक में हैं, जहां ₹2,000 से ज्यादा के ट्रांजेक्शन पर 1.1% से 2% तक का MDR लग सकता है। हालांकि, छोटे दुकानदारों की तरफ से इसे लेकर रेजिस्टेंस (विरोध) देखने को मिल सकता है। इसके अलावा, PhonePe, Google Pay और Paytm जैसे चुनिंदा प्लेयर्स पर अत्यधिक निर्भरता भी रेगुलेटरी जोखिम पैदा करती है। बाजार अब इस पर नजर टिकाए है कि सरकार MDR स्ट्रक्चर को लेकर क्या नया फैसला लेती है, जो बैंकों के प्रॉफिट पर सीधा असर डालेगा।
