भारत का UPI इकोसिस्टम तेजी से बढ़ रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2027 की पहली छमाही में UPI ने **145 अरब** ट्रांजैक्शन का आंकड़ा पार कर लिया है, जो पिछले साल के मुकाबले **27%** ज्यादा है। हालांकि, अब बड़े मर्चेंट ट्रांजैक्शंस के लिए नए नियम लागू होने जा रहे हैं।
भारत में डिजिटल पेमेंट की रफ्तार थमने का नाम नहीं ले रही है। चालू फाइनेंशियल ईयर की पहली छमाही में UPI ने 145 अरब ट्रांजैक्शन दर्ज किए हैं, जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह आंकड़ा 114 अरब था। अब इस डिजिटल क्रांति को और अधिक सस्टेनेबल बनाने के लिए 15 अक्टूबर 2026 से एक बड़ा बदलाव किया जा रहा है। अब ₹2,000 से ज्यादा के मर्चेंट पेमेंट (P2M) पर 0.4% का मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू होगा।
क्या है नए नियम का आधार?
इस कदम का मुख्य मकसद पेमेंट प्रोवाइडर्स की फाइनेंशियल स्थिति को मजबूत करना है। हालांकि, NPCI ने आम लोगों और छोटे दुकानदारों का खास ख्याल रखा है।
- P2P फ्री रहेगा: एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति (Peer-to-Peer) को भेजे जाने वाले पैसे पर कोई चार्ज नहीं लगेगा।
- छोटे व्यापारियों को राहत: वे मर्चेंट जो QR कोड के जरिए महीने में ₹1 लाख से कम का ट्रांजैक्शन करते हैं, उन्हें इन नए शुल्कों से बाहर रखा गया है।
- फीस की कैपिंग: बहुत बड़े ट्रांजैक्शन के लिए फीस की अधिकतम सीमा ₹300 तय की गई है, जो ₹75,000 या उससे ज्यादा के पेमेंट पर लागू होगी।
फीस का बंटवारा कैसे होगा?
इकट्ठा किए गए MDR का बंटवारा एक पारदर्शी तरीके से किया जाएगा। इसमें 40% हिस्सा कस्टमर के बैंक को, 30% पेमेंट गेटवे को, 20% UPI ऐप को और 10% स्पॉन्सरिंग बैंक को दिया जाएगा।
बाजार का क्या है रुख?
भले ही कुछ व्यापारी संगठनों ने इस पर आपत्ति जताई थी और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा था, लेकिन कोर्ट ने नई व्यवस्था को रोकने से इनकार कर दिया है। सितंबर 2026 में वॉल्यूम में मामूली 1.7% की गिरावट (कुल 24.07 अरब ट्रांजैक्शन) देखी गई है, जिसे एक्सपर्ट्स केवल कैलेंडर प्रभाव मान रहे हैं। अब देखना यह होगा कि 15 अक्टूबर से लागू होने वाली यह नई फीस हाई-वैल्यू ट्रांजैक्शंस को कैसे प्रभावित करती है।
