डिजिटल पेमेंट की दुनिया में बड़ा बदलाव आने वाला है! भारत सरकार ने 2026 के 'टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) बिल' में एक ऐसा प्रावधान जोड़ा है, जिससे भविष्य में चुनिंदा UPI पेमेंट्स पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाया जा सकता है। हालांकि, सरकार ने साफ कर दिया है कि आम ग्राहकों और एक-दूसरे को पैसे भेजने (P2P) के लिए UPI हमेशा की तरह फ्री रहेगा। इस कदम का मकसद बैंकों और फिनटेक कंपनियों को बढ़ते इंफ्रास्ट्रक्चर और सिक्योरिटी खर्चों को वसूलने में मदद करना है।
क्या है MDR और क्यों ज़रूरी?
'टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) बिल, 2026' के पास होने के बाद, अब सरकार कुछ खास UPI ट्रांजैक्शन पर MDR लगाने का अधिकार रखती है। MDR वह फीस होती है जो कोई भी मर्चेंट (विक्रेता) डिजिटल पेमेंट को प्रोसेस करने के लिए पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर को देता है। फिलहाल, UPI पर न तो भेजने वाले से और न ही मर्चेंट से कोई फीस ली जाती है। इस 'जीरो-फी' मॉडल ने UPI को बेहद लोकप्रिय बनाया है, लेकिन पेमेंट कंपनियों के लिए यह एक बड़ी चुनौती बन गया है।
इंडस्ट्री के एक्सपर्ट्स का कहना है कि अभी सरकार की ओर से मिलने वाली सब्सिडी, UPI नेटवर्क को चलाने के कुल खर्च का सिर्फ 10-11% ही कवर करती है। ऐसे में सर्वर का खर्च, फ्रॉड से बचाव और साइबर सिक्योरिटी जैसी मोटी रकम बैंकों और फिनटेक कंपनियों को खुद ही उठानी पड़ रही है। UPI ट्रांजैक्शन की संख्या भले ही तेजी से बढ़ रही हो, लेकिन कमाई का जरिया न होने से इन कंपनियों के मुनाफे (Profit Margin) पर दबाव बढ़ रहा है।
आम आदमी के लिए क्या बदलेगा?
सरकार ने साफ किया है कि आम उपभोक्ताओं को कोई दिक्कत नहीं होगी। UPI आम ग्राहकों के लिए और एक-दूसरे को पैसे भेजने (P2P) के लिए पूरी तरह फ्री रहेगा। MDR का बोझ सिर्फ बड़े व्यापारियों पर डालने की तैयारी है, और वह भी एक तय सीमा (Threshold) पार करने वाले ट्रांजैक्शन पर। इसका मकसद छोटे व्यापारियों और आम लोगों के लिए डिजिटल पेमेंट को सुलभ बनाए रखना है, साथ ही इंडस्ट्री को कुछ हद तक लागत वसूलने का मौका देना है।
इंडस्ट्री की स्थिति और भविष्य की राह
अभी डेबिट कार्ड पर 0.5% (₹2,000 तक) और 0.9% (₹2,000 से ऊपर) का MDR लगता है। क्रेडिट कार्ड पर यह 1.8% तक जा सकता है। UPI के भारत का सबसे बड़ा पेमेंट नेटवर्क बनने के बाद, जीरो-फी UPI और फी-आधारित कार्ड मॉडल के बीच का अंतर बहस का मुद्दा बन गया है। 'पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया' जैसी संस्थाओं ने 0.3% से 0.5% के बीच एक मामूली MDR का सुझाव दिया है, ताकि डिजिटल अपनाने को हतोत्साहित किए बिना एक टिकाऊ रेवेन्यू मॉडल तैयार हो सके।
निवेशकों के लिए अहम बातें
निवेशकों को इस पॉलिसी के लागू होने को लेकर अनिश्चितता पर नज़र रखनी होगी। हालांकि कानून MDR की इजाजत देता है, लेकिन NPCI की 'UPI एंड सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी' को अभी फाइनल रेट और मर्चेंट थ्रेशोल्ड तय करने हैं। अगर फीस बहुत ज्यादा रखी गई, तो मर्चेंट विरोध कर सकते हैं या वापस कैश की ओर लौट सकते हैं, जो डिजिटल इंडिया के लक्ष्य को नुकसान पहुंचाएगा। वहीं, अगर फीस बहुत कम रखी गई, तो फिनटेक कंपनियों का दबाव कम नहीं होगा।
आने वाले समय में यह देखना होगा कि सरकार इस शुल्क को कैसे लागू करती है और इसका लिस्टेड फिनटेक फर्मों और बैंकों की प्रॉफिटेबिलिटी पर क्या असर पड़ता है।
