यूके कोर्ट ऑफ अपील ने Libor-rigging स्कैंडल से जुड़े Barclays के पांच पूर्व ट्रेडर्स की धोखाधड़ी की सजा को पलट दिया है। **2025** के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर आए इस निर्णय से **2008** के वित्तीय संकट से जुड़े लंबे कानूनी विवाद का अंत हो गया है।
यूके कोर्ट ऑफ अपील ने Barclays के पांच पूर्व कर्मचारियों—जोनाथन मैथ्यू, जे मर्चेंट, एलेक्स पैबोन, फिलिप मोरीउसेफ और कॉलिन बर्मिंघम—की धोखाधड़ी की सजा को औपचारिक रूप से खारिज कर दिया है। इन लोगों को 2016 और 2019 के बीच 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान Libor और Euribor जैसे इंटरेस्ट रेट बेंचमार्क में हेरफेर करने के आरोप में सजा सुनाई गई थी।
कानूनी दांव-पेच और फैसला
यह घटनाक्रम जुलाई 2025 में यूके सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले के बाद आया है, जिसमें यह पाया गया कि पिछली बैंकिंग सुनवाई के दौरान जजों ने जूरी को जो निर्देश दिए थे, वे कानूनी रूप से गलत थे। इन निर्देशों को अनुचित मानते हुए पिछली सजाओं को 'असुरक्षित' करार दिया गया। इसके बाद, सीरियस फ्रॉड ऑफिस (SFO) ने अपील का विरोध न करने और दोबारा मुकदमा न चलाने का निर्णय लिया, क्योंकि न्यायिक त्रुटियों ने इन सभी मामलों को प्रभावित किया था।
क्या है निवेशकों के लिए मतलब?
Libor स्कैंडल बैंकिंग इतिहास की सबसे बड़ी जांचों में से एक थी। इन बेंचमार्क्स का उपयोग होम लोन से लेकर डेरिवेटिव्स तक की ब्याज दरें तय करने में होता था, जिनमें हेरफेर के आरोप लगे थे। निवेशकों के लिए यह जानना जरूरी है कि यह फैसला केवल आपराधिक न्याय प्रक्रिया की त्रुटियों को सुधारने के लिए है, न कि बैंक के मौजूदा कारोबार पर कोई असर डालने के लिए। चूंकि ये घटनाएं करीब दो दशक पुरानी हैं और संबंधित बेंचमार्क अब अस्तित्व में नहीं हैं, इसलिए इस फैसले से बैंक पर कोई नया वित्तीय जुर्माना या रेगुलेटरी लायबिलिटी नहीं आएगी।
फिलहाल, डॉयचे बैंक के पूर्व ट्रेडर क्रिश्चियन बिटर का मामला अभी भी अलग कानूनी प्रक्रिया के तहत विचाराधीन है। इस फैसले के साथ ही, एक दशक से अधिक समय से चल रहा कानूनी विवाद अब समाप्त हो गया है और बैंक के ऑपरेशंस पर इसका कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा।
