UAE, भारत की FCNR (B) डिपॉजिट स्कीम के लिए सबसे बड़ा सोर्स बनकर उभरा है। खाड़ी देश ने कुल उठाए गए $20 अरब में से $10 अरब से ज़्यादा का योगदान दिया है। हालांकि, ऊंची डॉलर ब्याज दरें और टैक्स बेनेफिट्स के बावजूद, UAE में भारतीय बैंक शाखाओं के सामने आने वाली ऑपरेशनल दिक्कतें फंड जुटाने में और बाधा डाल रही हैं।
UAE से भारत में आया रिकॉर्ड FCNR डिपॉजिट
संयुक्त अरब अमीरात (UAE) भारत की फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (बैंक) या FCNR (B) डिपॉजिट स्कीम के लिए सबसे बड़ा सोर्स बन गया है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, खाड़ी देश ने इस प्रोग्राम में $10 अरब से ज़्यादा का योगदान दिया है, जो भारतीय बैंकों द्वारा 17 जुलाई 2026 तक जुटाए गए कुल $20 अरब का आधा हिस्सा है। यह डिपॉजिट स्कीम नॉन-रेजिडेंट भारतीयों को विदेशी मुद्राओं में अकाउंट बनाए रखने की सुविधा देती है, जिससे वे एक्सचेंज रेट के उतार-चढ़ाव से सुरक्षित रहते हैं और साथ ही ब्याज भी कमाते हैं।
जमा में बढ़ोतरी के कारण?
इस ज़बरदस्त मांग के पीछे कई कारण हैं। UAE में बसे भारतीय प्रवासियों को आकर्षक डॉलर डिपॉजिट रेट का फायदा मिलता है, साथ ही उन्हें टैक्स-फ्री ब्याज आय का लाभ भी होता है। इसके अलावा, कुछ बैंकों ने तो लीवरेज फैसिलिटी (Leverage Facility) भी ऑफर की है, जिससे ग्राहक अपने डिपॉजिट का इस्तेमाल लोन या अन्य वित्तीय लाभ पाने के लिए कर सकते हैं, जिसने भागीदारी को और बढ़ाया है।
ऑपरेशनल दिक्कतें बन रहीं बाधा
इस भारी इनफ्लो के बावजूद, UAE से फंड जुटाने की कुल क्षमता ऑपरेशनल चुनौतियों के कारण सीमित बनी हुई है। ज़्यादातर भारतीय बैंक फिलहाल इस क्षेत्र में अपने प्रतिनिधि कार्यालयों (Representative Offices) के ज़रिए काम कर रहे हैं, जिनकी तुलना में फुल-सर्विस रिटेल बैंक शाखाओं पर सख्त रेगुलेटरी सीमाएं लागू होती हैं। ये प्रतिबंध अक्सर बैंकों को कोर एक्टिविटीज़ जैसे डायरेक्ट क्रॉस-सेलिंग, विस्तृत डॉक्यूमेंटेशन प्रोसेसिंग और पूरी तरह से व्यावसायिक सुविधा देने से रोकते हैं।
प्रमुख बैंकों की स्थिति
बड़े भारतीय बैंकों में, ऑपरेशनल स्ट्रक्चर में काफी भिन्नता है। बैंक ऑफ बड़ौदा (Bank of Baroda) एक महत्वपूर्ण अपवाद बना हुआ है, जिसके पास UAE में ज़्यादा ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी देने वाला एक फुल रिटेल बैंकिंग लाइसेंस है। इसके विपरीत, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (State Bank of India) जैसी संस्थाएं ज़्यादा प्रतिबंधात्मक लाइसेंसिंग के तहत काम करती हैं, जो उन्हें अप्रवासी भारतीयों की बचत का एक बड़ा हिस्सा हासिल करने से रोकता है।
आगे की राह
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि कुछ प्राइवेट बैंकों ने लोकल UAE लेंडर्स के साथ मिलकर स्टैंडबाय लेटर ऑफ क्रेडिट (SBLC) रूट के ज़रिए इन सीमाओं को पार करने की कोशिश की है, लेकिन यह चैनल फिलहाल अनुमानित $60 अरब के मार्केट अवसर का एक छोटा सा हिस्सा ही है। इसके अलावा, बैंक इन डिपॉजिट्स के बदले लोन देने में सावधानी बरतते हैं, और कड़े वित्तीय मूल्यांकन के बाद ही हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स के लिए लीवरेज फैसिलिटी आरक्षित रखते हैं।
निवेशक इस बात पर नज़र रख सकते हैं कि रेगुलेटरी नीतियां कैसे विकसित होती हैं, क्योंकि भारतीय बैंक प्रतिनिधि कार्यालयों पर लगी किसी भी तरह की पाबंदियों में ढील से अतिरिक्त लिक्विडिटी (Liquidity) मिल सकती है। बैंकों की इन ऑपरेशनल बाधाओं से निपटने और स्थिर क्रेडिट क्वालिटी बनाए रखने की क्षमता इस क्षेत्र में FCNR (B) प्रोग्राम की दीर्घकालिक सफलता के लिए एक प्रमुख कारक बनी रहेगी।
