भारत के टियर-2 और टियर-3 शहरों में होम लोन की डिमांड का नया दौर शुरू हो चुका है। साल 2025 में इन शहरों का कुल होम लोन वॉल्यूम में **64%** का हिस्सा हो गया है और इसमें साल-दर-साल **81%** की जबरदस्त बढ़त देखी गई है।
डिजिटल क्रांति और बदलता दौर
हाउसिंग फाइनेंस सेक्टर में यह बदलाव पूरी तरह से टेक्नोलॉजी पर आधारित है। होम लोन की प्रक्रिया अब कागजी कार्रवाई से निकलकर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर आ गई है। साल 2024 तक करीब 92% होम लोन एप्लिकेशन डिजिटल माध्यमों से प्रोसेस किए गए, जो साल 2020 में केवल 60% थे। इस डिजिटल बदलाव ने लेंडर्स को दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचने में मदद की है, जिससे अब बड़े शहरों पर निर्भरता कम हो रही है।
ऑपरेशन्स में चुनौतियां और जोखिम
छोटे शहरों में विस्तार भले ही आकर्षक लग रहा हो, लेकिन लेंडर्स के लिए यह राह आसान नहीं है। प्रॉपर्टी की फिजिकल वेरिफिकेशन और ऑन-साइट असेसमेंट को डिजिटल नहीं किया जा सकता, इसलिए कंपनियों को एक 'हाइब्रिड मॉडल' अपनाना पड़ रहा है, जिससे खर्च बढ़ता है। साथ ही, पब्लिक सेक्टर बैंकों की आक्रामक नीतियों के कारण मार्जिन पर दबाव बढ़ रहा है।
निवेशकों के लिए अहम संकेत
निवेशकों को अब यह देखना होगा कि कंपनियां अपनी ग्रोथ और एसेट क्वालिटी के बीच कैसा संतुलन बनाती हैं। 'नेट इंटरेस्ट मार्जिन' (NIM) पर नजर रखना बहुत जरूरी है, क्योंकि छोटे शहरों में विस्तार के दौरान रिस्क मैनेजमेंट और बैड लोन को कंट्रोल में रखना किसी भी फाइनेंशियल कंपनी के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।
