Tata Sons की संभावित लिस्टिंग और IPO के मुद्दे पर Tata Trusts के भीतर बड़ा गवर्नेंस संकट पैदा हो गया है। जहां एक तरफ बोर्ड RBI के नियमों का पालन करना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ ट्रस्टीज कंपनी को प्राइवेट रखने के लिए रीस्ट्रक्चरिंग की योजना बना रहे हैं। यह मामला अब महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर तक पहुंच गया है।
क्या है पूरा विवाद?
Sir Dorabji Tata Trust (SDTT) के नेतृत्व में चल रहा यह आंतरिक संकट Tata Sons के भविष्य पर सवालिया निशान लगा रहा है। चेयरमैन Noel Tata के नेतृत्व में एक गुट ने वाइस-चेयरमैन Venu Srinivasan और Vijay Singh को एक औपचारिक पत्र लिखकर नाराजगी जताई है। मुख्य विवाद इस बात पर है कि क्या ग्रुप की होल्डिंग कंपनी को शेयर बाजार में लिस्ट होना चाहिए या नहीं।
RBI का कड़ा रुख
यह सारा टकराव Reserve Bank of India (RBI) के एक नियम से शुरू हुआ है। Tata Sons को 'Upper Layer' NBFC के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिसके चलते इसे शेयर बाजार में लिस्ट होना अनिवार्य है। चेयरमैन N. Chandrasekaran की अगुवाई में बोर्ड IPO की तैयारी कर रहा है, लेकिन Tata Trusts का एक बड़ा हिस्सा कंपनी को प्राइवेट ही रखना चाहता है।
रीस्ट्रक्चरिंग का दांव और विरोध
लिस्टिंग की अनिवार्यता से बचने के लिए ट्रस्टीज ने एक जटिल रीस्ट्रक्चरिंग प्लान बनाया है। इसमें Tata Electronics Systems Solutions और Tata Consulting Engineers को Tata Sons में मर्ज करने का प्रस्ताव है, ताकि कंपनी का वित्तीय क्लासिफिकेशन बदल सके और वह RBI के नियमों के दायरे से बाहर हो जाए।
हालांकि, Venu Srinivasan और Vijay Singh ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि इस फैसले में उनसे सही सलाह-मशविरा नहीं लिया गया और इससे चैरिटेबल संस्था का दर्जा खतरे में पड़ सकता है। मामला अब महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के पास है, जबकि Noel Tata के गुट ने भी अपनी बात रखने के लिए 'Caveat' दाखिल कर दिया है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
RBI ने सितंबर 2026 तक कंपनी की CIC (Core Investment Company) रजिस्ट्रेशन को सरेंडर करने की अर्जी भी खारिज कर दी है, जिससे लिस्टिंग का दबाव और बढ़ गया है। फिलहाल, चैरिटी कमिश्नर का फैसला और RBI के अगले कदम पर बाजार की नजरें टिकी हैं।
