रेगुलेटरी नियम और लिस्टिंग की मजबूरी
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने सितंबर 2022 में टाटा संस को 'अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी' (NBFC-UL) का दर्जा दिया था। इस वर्गीकरण के तहत, ऐसी कंपनियों को तीन साल के भीतर स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होना अनिवार्य है। इसका मतलब है कि टाटा संस के लिए सितंबर 2025 तक लिस्टिंग की समय सीमा तय है। शापूरजी पल्लोनजी (SP) ग्रुप, जो टाटा संस में 18.38% हिस्सेदारी रखता है, इस मामले को गंभीरता से लेने की अपील कर रहा है। टाटा संस NBFC के तौर पर डी-रजिस्ट्रेशन की कोशिश कर रहा था, लेकिन RBI की पॉलिसी को देखते हुए छूट मिलना मुश्किल लग रहा है।
वैल्यू अनलॉक और शेयरहोल्डर
SP ग्रुप का मानना है कि पब्लिक लिस्टिंग से 1.2 करोड़ से ज्यादा शेयरधारकों को फायदा होगा, क्योंकि वे लिस्टेड टाटा कंपनियों के जरिए परोक्ष रूप से टाटा संस से जुड़े हैं। एनालिस्ट्स का अनुमान है कि टाटा संस का वैल्यूएशन ₹8 लाख करोड़ (लगभग $96 बिलियन) तक पहुंच सकता है। कंपनी की लिस्टेड कंपनियों में हिस्सेदारी की वैल्यू करीब ₹16 लाख करोड़ आंकी गई है। लिस्टिंग से छोटे शेयरधारकों को निकलने का रास्ता मिलेगा और कंपनी को विस्तार के लिए कैपिटल भी मिल सकेगा।
अंदरूनी समर्थन भी बढ़ा
पहले टाटा संस में IPO को लेकर अंदरूनी विरोध था, लेकिन अब हालात बदलते दिख रहे हैं। टाटा ट्रस्ट्स के कुछ ट्रस्टियों, जैसे वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह, ने भी पब्लिक लिस्टिंग का समर्थन किया है। उनका कहना है कि लिस्टिंग से पारदर्शिता बढ़ेगी और कंपनी को ग्रोथ के लिए फंड मिलेगा।
मार्केट में IPO की बहार
भारत का कैपिटल मार्केट इस वक्त IPO के लिए शानदार माहौल में है, खासकर फाइनेंशियल सेक्टर में। ऐसे में, टाटा संस जैसे बड़े ग्रुप की लिस्टिंग निवेशकों को आकर्षित कर सकती है। अगर टाटा संस सभी रेगुलेटरी बाधाओं को पार कर लेता है, तो यह भारतीय कॉरपोरेट जगत के लिए एक बड़ी घटना साबित हो सकती है।
चुनौतियां और चिंताएं
हालांकि, लिस्टिंग की राह में कुछ मुश्किलें भी हैं। टाटा संस की जटिल संरचना, फंडामेंटल वैल्यूएशन पर मतभेद और SP ग्रुप तथा टाटा ट्रस्ट्स के बीच पुराने विवाद लिस्टिंग की राह में बाधा बन सकते हैं। RBI का अंतिम फैसला भी अहम होगा, जो लिस्टिंग की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।