Tata Capital और Godrej Capital ने गोल्ड लोन सेगमेंट में कदम रखा है। दोनों कंपनियां एक्विजिशन (Acquisition) के ज़रिए इस सेक्टर में आ रही हैं, ताकि बढ़ती मांग और सोने की ऊंची कीमतों का फायदा उठाया जा सके। इससे उन्हें शुरुआत से ब्रांच नेटवर्क बनाने की झंझट से मुक्ति मिलेगी।
बड़े खिलाड़ियों की गोल्ड लोन में एंट्री!
Tata Capital और Godrej Capital अब गोल्ड लोन (Gold Loan) के धंधे में उतरने की तैयारी में हैं। दोनों बड़ी कंपनियां इस सेक्टर में एक्विजिशन (Acquisition) के ज़रिए दस्तक दे रही हैं। इससे उन्हें एकदम से बने-बनाए ब्रांच नेटवर्क और अनुभवी टीम मिल जाएगी, बजाय इसके कि वे खुद ही सब कुछ शुरू से बनाएं।
ग्रोथ का बड़ा प्लान
Godrej Capital के लिए यह एक्विजिशन, Godrej Finance के लॉन्ग-टर्म प्लान का अहम हिस्सा है। कंपनी का लक्ष्य है कि 2031 तक गोल्ड-लोन पोर्टफोलियो से ₹5,000 करोड़ का एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) हासिल किया जाए। वहीं, Tata Capital भी रेगुलेटरी अप्रूवल (Regulatory Approval) मिलने का इंतज़ार कर रही है और इसका इस्तेमाल करके अपने ब्रांच नेटवर्क को बढ़ाने और सिक्योर रिटेल लेंडिंग (Secured Retail Lending) में अपनी जगह बनाने की योजना बना रही है।
बाजार का मिजाज और खतरे
गोल्ड लोन सेक्टर नॉन-बैंक लेंडर्स (Non-Bank Lenders) के लिए काफी आकर्षक हो गया है, क्योंकि इसमें गारंटी के तौर पर फिजिकल सोना होता है। हालांकि, इस सेक्टर में चुनौतियां भी कम नहीं हैं। बाजार में तेज़ी के साथ-साथ सोने की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव भी देखने को मिल रहा है। सोने के दाम बढ़ने से गारंटी का मूल्य तो बढ़ता है, लेकिन अगर कीमतें अचानक गिरती हैं, तो लोन-टू-वैल्यू (Loan-to-Value) रेशियो पर दबाव आ सकता है, जिससे उधारी चुकाने में परेशानी हो सकती है और डिफॉल्सी (Delinquency) का खतरा बढ़ सकता है।
RBI की पैनी नज़र
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) गोल्ड लोन सेगमेंट पर कड़ी नज़र रखे हुए है और ज़िम्मेदार लेंडिंग प्रैक्टिसेज (Responsible Lending Practices) पर ज़ोर दे रहा है। जैसे-जैसे ये बड़ी कंपनियां अपने पोर्टफोलियो का विस्तार करेंगी, उन्हें सख्त रेगुलेटरी माहौल में काम करना होगा। RBI की हालिया फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट (Financial Stability Report) में भी कहा गया है कि कीमतों में अस्थिरता के बीच तेज़ी से क्रेडिट ग्रोथ के लिए मज़बूत रिस्क मैनेजमेंट सिस्टम (Risk Management System) की ज़रूरत है। ऐसे में, निवेशकों को यह देखना होगा कि ये कंपनियां आक्रामक विस्तार के साथ-साथ रेगुलेटरी उम्मीदों और फिजिकल गोल्ड को संभालने के ऑपरेशनल रिस्क (Operational Risk) को कैसे मैनेज करती हैं।
