Yes Bank AT1 Bonds पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला बाकी, ₹1 लाख करोड़ के कर्ज पर असर

BANKINGFINANCE
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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Yes Bank AT1 Bonds पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला बाकी, ₹1 लाख करोड़ के कर्ज पर असर
Overview

सुप्रीम कोर्ट जल्द ही Yes Bank के AT1 बॉन्ड राइट-डाउन (write-down) के भाग्य पर फैसला सुनाएगा। यह फैसला ऐसे ही करीब **$12 अरब** (या **₹1 लाख करोड़**) के कर्ज को प्रभावित कर सकता है। सरकार का तर्क है कि राइट-डाउन RBI के नियमों के अनुसार हुआ, लेकिन बॉन्ड होल्डर्स का मानना है कि रिकंस्ट्रक्शन प्लान (reconstruction plan) को उनके निवेश की रक्षा करनी चाहिए थी। कोर्ट का फैसला यह स्पष्ट करेगा कि रिकंस्ट्रक्शन स्कीम, RBI के नियम और बॉन्ड कॉन्ट्रैक्ट कैसे आपस में इंटरैक्ट करते हैं।

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कानूनी दांव-पेच और ₹1 लाख करोड़ का सवाल

सुप्रीम कोर्ट अब Yes Bank के एडिशनल टियर-1 (AT1) बॉन्ड्स के विवादास्पद राइट-डाउन पर अपना फैसला सुनाने वाला है। यह फैसला पूरे भारत के AT1 बॉन्ड मार्केट को नई दिशा दे सकता है। अधिकारियों ने कोर्ट को बताया है कि इस फैसले का असर बैंकिंग सेक्टर में चल रहे करीब $12 अरब (या ₹1 लाख करोड़) के AT1 बॉन्ड्स पर पड़ सकता है।

लीगल आर्गुमेंट्स का टकराव

मुख्य मुद्दा यह है कि Yes Bank के $10 अरब (या ₹8,415 करोड़) के AT1 बॉन्ड्स का राइट-डाउन बैंक की रिकंस्ट्रक्शन स्कीम के तहत हुआ या फिर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के मास्टर सर्कुलर और बॉन्ड एग्रीमेंट के तहत। सरकार के वकील ने दलील दी कि AT1 बॉन्ड्स पूरी तरह से RBI के रेगुलेशन और कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों से चलते हैं, न कि सीधे रिकंस्ट्रक्शन स्कीम से। उन्होंने कहा कि RBI के मास्टर सर्कुलर में राइट-डाउन के लिए एक विस्तृत फ्रेमवर्क है, जिसमें बैंक का "नॉन-वॉयबिलिटी" (यानी दिवालिया होने की कगार पर होना) मुख्य ट्रिगर है।

टाइमिंग और प्रक्रिया पर बहस

सरकारी वकीलों ने समझाया कि Yes Bank का रिकंस्ट्रक्शन, जो मार्च 2020 में गंभीर वित्तीय संकट के दौरान शुरू हुआ था, एक स्टेप-बाय-स्टेप प्रोसेस था। उनका कहना था कि राइट-डाउन के लिए "नॉन-वॉयबिलिटी" का ट्रिगर रिकंस्ट्रक्शन पूरा होने से पहले भी आ सकता है। सरकार ने यह भी चेतावनी दी कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) द्वारा कैपिटल इन्फ्यूजन (capital infusion) से पहले AT1 बॉन्ड्स का राइट-डाउन करने से Yes Bank की पहले से नाजुक वित्तीय स्थिति और बिगड़ सकती थी, जिससे पूरे बचाव प्रयास पर खतरा मंडरा सकता था। यह बैंक रेस्क्यू के दौरान अधिकारियों द्वारा संभाले जाने वाले नाजुक संतुलन को दर्शाता है।

बॉन्ड होल्डर्स की चुनौती

बॉन्ड होल्डर्स का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों ने तर्क दिया कि Yes Bank की अंतिम रिकंस्ट्रक्शन स्कीम में AT1 बॉन्ड्स के राइट-डाउन या कन्वर्जन (conversion) की कोई स्पष्ट आवश्यकता या अनुमति नहीं थी। उन्होंने बताया कि स्कीम के शुरुआती ड्राफ्ट्स में ऐसे प्रावधान थे, लेकिन अंतिम संस्करण से उन्हें हटा दिया गया था, जिससे बॉन्ड होल्डर्स को बचाने का इरादा जाहिर होता है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी दावा किया कि भले ही RBI मास्टर सर्कुलर और बॉन्ड की शर्तें लागू होतीं, तो भी किसी भी राइट-डाउन से पहले एक सख्त ड्यू प्रोसेस (due process) और सेफगार्ड्स (safeguards) का पालन जरूरी था। उन्होंने स्कीम लागू होने के बाद एडमिनिस्ट्रेटर (administrator) के बॉन्ड्स को एकतरफा रद्द करने के अधिकार पर भी सवाल उठाए।

सिस्टमिक चिंताओं बनाम तथ्य

बॉन्ड होल्डर्स ने सरकार की सिस्टमिक रिस्क (systemic risk) की चेतावनियों का खंडन करते हुए कहा कि इस मामले को इसके विशिष्ट तथ्यों पर परखा जाना चाहिए: क्या Yes Bank मामले में कानून और ड्यू प्रोसेस का सही ढंग से पालन किया गया था। सुप्रीम कोर्ट बेंच तीन मुख्य सवालों पर केंद्रित रही है: बैंक का कानूनी रिकंस्ट्रक्शन वास्तव में कब शुरू होता है, राइट-डाउन का आदेश देने का अधिकार किसके पास है, और क्या "नॉन-वॉयबिलिटी" ट्रिगर अकेले खड़ा हो सकता है या बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट (Banking Regulation Act) के तहत पूरे हुए रिकंस्ट्रक्शन से जुड़ा होना चाहिए।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.