कोर्ट ने गिनाईं लोन देने में असमानताएं
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर गौर किया है कि बैंक बड़े कॉरपोरेट लोन की तुलना में छोटे व्यक्तिगत कर्ज़ों को कैसे अलग तरीके से संभालते हैं। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन ने कहा कि बड़ी कंपनियों को भारी-भरकम क्रेडिट (Credit) देते समय बैंक काफी "कैजुअल" (Casual) रवैया अपनाते हैं। यह रवैया उन "कड़े नियमों और लंबी प्रक्रियाओं" से बिल्कुल अलग है, जिसे कोर्ट ने व्यक्तिगत लोन लेने वालों के लिए "लगभग उत्पीड़न" बताया है। कोर्ट इस "चिंताजनक ट्रेंड" को एक व्यवस्थित पक्षपात के तौर पर देख रही है।
सबके लिए समान लोन की वकालत
इस मसले पर, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को सुझाव दिया है कि वह आम जनता, खासकर निम्न-आय वर्ग के लोगों के लिए लोन की उपलब्धता बढ़ाने के लिए नीतियां बनाए। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि लोन देने के बुनियादी नियमों को कमज़ोर किया जाए, जो अभी भी रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) और बैंकों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। मुख्य उद्देश्य लोन आवेदन और वसूली की प्रक्रियाओं को ज़्यादा निष्पक्ष और सुगम बनाना है।
केस स्टडी: SBI और भास्कर इंटरनेशनल
सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियां स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) और भास्कर इंटरनेशनल से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान आईं। मामला 2019 में SBI द्वारा दिए गए ₹8 करोड़ से ज़्यादा के लोन की वसूली से संबंधित था। कोर्ट ने SBI अधिकारियों द्वारा इस लोन को मंज़ूरी देने में "लापरवाही" पाई, क्योंकि उधार लेने वाला भुगतान शुरू नहीं कर सका और खाता जल्द ही नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) बन गया। हालांकि कोर्ट ने SBI की संपत्ति ज़ब्त करने पर रोक लगाने की भास्कर इंटरनेशनल की याचिका खारिज कर दी, लेकिन इस मामले का इस्तेमाल उसने बैंकिंग प्रथाओं के प्रति अपनी व्यापक चिंताओं को उजागर करने के लिए किया।
लोन की नीतियां और वसूली के तरीके
सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियां भारतीय बैंकों की लोन देने और वसूली की प्रथाओं पर चल रही चर्चाओं को नई दिशा देती हैं। भारत में रिटेल लोन (Retail Loan) का कारोबार बढ़ा है, जो 2025 तक मैनेजमेंट के तहत एसेट्स (Assets) का 35% हो जाएगा, जबकि 2018 में यह 28% था। वहीं, कॉर्पोरेट लोन (Corporate Loan) इसी अवधि में 50% से घटकर 38% रह गया है। इसी के साथ, पर्सनल लोन (Personal Loan) के NPA में भी बढ़ोतरी हुई है, जो 2022 में 1.6% तक पहुंच गया, जबकि 2022 में यह 0.9% था। यह रिटेल लोन सेगमेंट में संभावित दबाव का संकेत देता है। SBI द्वारा भास्कर इंटरनेशनल को दिए गए लोन के आकलन की सुप्रीम कोर्ट की आलोचना, जहां बड़ी रकम का लोन तुरंत डिफ़ॉल्ट (Default) होने के बावजूद मंजूर किया गया, बड़े कॉर्पोरेट लोन के लिए उचित जांच-पड़ताल में संभावित कमियों को दर्शाती है। भारत में वसूली की प्रक्रियाओं में सामान्य तरीके और SARFAESI Act और Debts Recovery Tribunals (DRTs) जैसे कानूनी एक्शन शामिल हैं। कोर्ट का निष्पक्ष वसूली की मांग करना बताता है कि कानूनी ढांचे मौजूद होने के बावजूद, उनके व्यावहारिक इस्तेमाल में सुधार की ज़रूरत है ताकि अनुचित कठिनाई से बचा जा सके।
जांच में विसंगति और वसूली की चुनौतियां
सुप्रीम कोर्ट के बयानों से एक मुख्य मुद्दा यह सामने आया है कि कॉर्पोरेट और व्यक्तिगत लोन के बीच जांच-पड़ताल के मानकों में स्पष्ट असमानता है। SBI द्वारा एक बड़े कॉर्पोरेट लोन को मंजूरी देने में "लापरवाही" का उल्लेख, छोटे लोन के लिए अपनाई जाने वाली कड़े, और कभी-कभी उत्पीड़न जैसे लगने वाले, प्रक्रियाओं के विपरीत है। इससे बड़े लोन के लिए जोखिम मूल्यांकन की पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं, खासकर तब जब तुरंत डिफ़ॉल्ट हो जाए। कॉर्पोरेट डिफ़ॉल्ट की वसूली की प्रक्रिया लंबी हो सकती है, जैसा कि भास्कर इंटरनेशनल मामले में देखा गया, जहां उधारकर्ता ने राहत मांगी थी। इसके अलावा, पर्सनल लोन NPA में बढ़ोतरी यह दर्शाती है कि कड़े व्यक्तिगत लोन नियमों के बावजूद वसूली एक चुनौती बनी हुई है। SBI की आंतरिक रिपोर्ट्स में वसूली की विभिन्न रणनीतियों का उल्लेख है, लेकिन कोर्ट की टिप्पणियां बताती हैं कि इन प्रक्रियाओं की प्रभावशीलता और निष्पक्षता, खासकर लोन की मंजूरी के मुकाबले, की करीब से जांच की जानी चाहिए।
