सुप्रीम कोर्ट ने Reliance Communications की रिव्यू पिटीशन खारिज कर दी है। कोर्ट ने साफ किया है कि स्पेक्ट्रम एक पब्लिक नेचुरल रिसोर्स है और इसे इंसॉल्वेंसी के दौरान कंपनी का एसेट नहीं माना जा सकता। इस फैसले से कंपनी के रिजॉल्यूशन प्लान्स पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है और बैंक गारंटी के तौर पर **₹802 करोड़** की रिकवरी की मार भी कंपनी को झेलनी होगी।
कानूनी दांव और कंपनी की मुश्किलें
सुप्रीम कोर्ट ने Reliance Communications (RCom) और उसकी सब्सिडियरी Reliance Telecom की रिव्यू पिटीशन को खारिज करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकारी स्पेक्ट्रम एक 'पब्लिक नेचुरल रिसोर्स' है, जिसे इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत कंपनी का कॉर्पोरेट एसेट नहीं माना जा सकता। इसका सीधा मतलब यह है कि कर्जदाता (Creditors) इस स्पेक्ट्रम को सीज या सेल करके अपना बकाया वसूल नहीं कर सकते।
रिजॉल्यूशन प्लान पर असर
यह फैसला NCLT मुंबई बेंच में चल रही RCom की रिजॉल्यूशन प्रक्रिया के लिए एक बड़ा झटका है। कंपनी के अधिकांश प्लान्स स्पेक्ट्रम की वैल्यूएशन और उसकी संभावित बिक्री पर निर्भर थे। अब जब स्पेक्ट्रम लिक्विडेशन एस्टेट (Liquidation Estate) का हिस्सा नहीं है, तो उन प्लान्स की व्यवहार्यता (Feasibility) पर बड़ा सवालिया निशान लग गया है।
लिक्विडिटी का दबाव
मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं। डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्युनिकेशंस (DoT) द्वारा बकाया स्पेक्ट्रम शुल्कों के लिए करीब ₹802 करोड़ की बैंक गारंटी भुनाने (Invoke) के फैसले पर भी सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करने से मना कर दिया है। इससे कंपनी की लिक्विडिटी और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया जैसे फाइनेंशियल क्रेडिटर्स की रिकवरी की उम्मीदों पर और दबाव बढ़ गया है।
मार्केट के लिए संकेत
यह फैसला पूरे टेलीकॉम और इंफ्रा सेक्टर के लिए एक लीगल प्रेसिडेंट बन गया है। अब सरकारी लाइसेंस और नेचुरल रिसोर्स पर निर्भर कंपनियों के लिए ऐसी संपत्तियों को कोलैटरल (Collateral) के तौर पर इस्तेमाल करना बेहद मुश्किल हो सकता है। भविष्य में निवेशकों को NCLT की अगली सुनवाई और कंपनी के कानूनी कदमों पर बारीक नजर रखनी होगी।
