UPI को लेकर पूर्व RBI गवर्नर डी. सुब्बाराव ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि बैंक फ्री ट्रांजैक्शंस के बोझ तले दबे हैं, इसलिए हाई-वैल्यू ट्रांजैक्शंस पर फीस लगाने पर विचार करना जरूरी है। हालांकि, P2P पेमेंट पहले की तरह फ्री बने रहने चाहिए।
पूर्व RBI गवर्नर डी. सुब्बाराव ने UPI के मौजूदा कॉस्ट स्ट्रक्चर पर बड़ी बहस छेड़ दी है। एक हालिया कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि डिजिटल ट्रांजैक्शंस के लिए वर्तमान 'फ्री मॉडल' ने अडॉप्शन तो बढ़ाया है, लेकिन यह बैंकिंग सिस्टम पर लंबा फिस्कल दबाव भी बना रहा है। सुब्बाराव का तर्क है कि पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर की सस्टेनेबिलिटी के लिए बड़ी ट्रांजैक्शंस पर मामूली फीस लगाना जरूरी है, क्योंकि फिलहाल इसका खर्च बैंक अपनी दूसरी सेवाओं के माध्यम से उठा रहे हैं।
जीरो-MDR का दबाव
मौजूदा 'जीरो-MDR' (Merchant Discount Rate) सिस्टम के चलते बैंकों और पेमेंट प्लेयर्स को ट्रांजैक्शन की सिक्योरिटी, इंफ्रास्ट्रक्चर और ऑपरेशन्स का भारी खर्च खुद उठाना पड़ता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि जैसे-जैसे डिजिटल पेमेंट का वॉल्यूम बढ़ रहा है, बैंकों के मार्जिन पर इसका दबाव और गहरा होता जा रहा है।
क्या कहता है नया कानून?
यह चर्चा ऐसे समय पर हो रही है जब सरकार ने 'Taxation and Other Laws (Amendment) Bill, 2026' के जरिए एक कानूनी ढांचा तैयार कर लिया है। इसके तहत सरकार को यह अधिकार मिल गया है कि वह भविष्य में UPI सहित अन्य डिजिटल मोड्स पर कुछ विशेष ट्रांजैक्शंस के लिए चार्ज लागू कर सकती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि फीस तुरंत शुरू हो रही है, लेकिन सरकार के पास अब कानूनी विकल्प मौजूद है।
आम आदमी पर क्या होगा असर?
नियामकों ने स्पष्ट किया है कि पर्सन-टू-पर्सन (P2P) ट्रांजैक्शंस, यानी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को किए जाने वाले आम पेमेंट, हमेशा की तरह फ्री बने रहेंगे। यदि कोई फीस लागू भी होती है, तो वह केवल चुनिंदा हाई-वैल्यू मर्चेंट ट्रांजैक्शंस तक सीमित रहने की उम्मीद है। निवेशकों की नजर अब इस बात पर है कि सरकार भविष्य में इसे कैसे लागू करती है, ताकि बैंकों का मुनाफा और फाइनेंशियल इंक्लूजन का लक्ष्य, दोनों के बीच संतुलन बना रहे।
