Standard Chartered Bank India अपनी रिटेल रणनीति में बड़ा बदलाव कर रहा है। बैंक अब अमीर ग्राहकों (wealthy and affluent customers) और छोटे व मध्यम उद्योगों (SME) पर ज़्यादा ध्यान देगा। मास-मार्केट सेगमेंट से हटने का फैसला बढ़ती प्रतिस्पर्धा और मुनाफे को लेकर आ रही चुनौतियों के चलते लिया गया है। यह बदलाव अगले **6 से 8 महीनों** में पूरा होने की उम्मीद है।
क्या हुआ है?
Standard Chartered Bank (SCB) India ने अपनी रिटेल बैंकिंग रणनीति में एक बड़ा फेरबदल किया है। 165 से ज़्यादा सालों से भारत में कारोबार कर रहा यह बैंक अब वेल्थ मैनेजमेंट, एफ्लुएंट बैंकिंग और स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइज (SME) सेक्टर पर ज़्यादा ध्यान केंद्रित करेगा। इसका मतलब है कि बैंक मास रिटेल सेगमेंट से पीछे हट रहा है, जहाँ वह पहले ज़्यादा ग्राहकों को लुभाने की कोशिश करता था। इस पूरी प्रक्रिया के 6 से 8 महीने में पूरा होने की उम्मीद है।
रणनीति क्यों बदली?
Standard Chartered Bank, India के MD और CEO, PD सिंह के अनुसार, इस बदलाव का मुख्य कारण भारतीय बैंकिंग सेक्टर में ज़बरदस्त प्रतिस्पर्धा है। बैंक अब एडवाइजरी-लेड मॉडल की ओर बढ़ना चाहता है, जहाँ वह मास मार्केट में सीधी टक्कर लेने के बजाय खास (bespoke) और क्रॉस-बॉर्डर बैंकिंग सॉल्यूशंस पर ज़ोर देगा। बैंक का मानना है कि बड़े पैमाने वाले रिटेल सेगमेंट में लगातार मुनाफा कमाना मुश्किल हो गया है, भले ही उनके लोन डिफॉल्ट रेट (delinquency rates) कंट्रोल में हों।
कॉर्पोरेट बैंकिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर पर ज़ोर
रिटेल के अलावा, बैंक अपनी कॉर्पोरेट बैंकिंग पर भी ज़बरदस्त फोकस बनाए हुए है। इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े प्रोजेक्ट फाइनेंस, जैसे रिन्यूएबल एनर्जी, पावर ट्रांसमिशन और इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) सप्लाई चेन, भारत में बैंक के कुल लोन बुक का लगभग 10% से 12% हिस्सा हैं। कंपनी के पाइपलाइन में भी अच्छी बढ़ोतरी देखी गई है, जो पिछले साल के मुकाबले लगभग 15% बढ़ी है। यह बढ़ोतरी प्राइवेट कैपिटल एक्सपेंडिचर और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में ग्रोथ से प्रेरित है।
GIFT City और विदेशी पूंजी
Standard Chartered अपनी GIFT City ऑपरेशंस का इस्तेमाल इंटरनेशनल ट्रांजैक्शंस, जैसे एयरक्राफ्ट फाइनेंसिंग और सिक्योरिटाइजेशन को आसान बनाने के लिए भी कर रहा है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा विदेशी मुद्रा के इनफ्लो को बढ़ावा देने के उपायों के साथ, बैंक FCNR(B) डिपॉजिट प्रोडक्ट्स को ज़ोर-शोर से प्रमोट कर रहा है। इन कदमों का मकसद भारतीय बैंकों और पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (PSUs) द्वारा फॉरेन करेंसी जुटाने के मौकों का फायदा उठाना है।
प्रतिस्पर्धी माहौल
भारत में फॉरेन बैंक बड़े पैमाने पर रिटेल मार्केट में अपनी पकड़ बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसकी मुख्य वजह बड़े डोमेस्टिक प्राइवेट सेक्टर बैंकों का आक्रामक विस्तार और डिजिटल पैठ है। एफ्लुएंट और वेल्थ सेगमेंट की ओर बढ़कर, Standard Chartered उन दूसरे फॉरेन संस्थानों की रणनीति अपना रहा है जो इंडिया में खास, हाई-वैल्यू और रिलेशनशिप-ड्रिवन बिजनेस पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जहाँ वे अपने ग्लोबल नेटवर्क का फायदा उठा सकें।
आगे क्या देखना होगा?
सबसे अहम बात यह होगी कि बैंक अपने मौजूदा 1.3 मिलियन ग्राहकों को इस नई, एडवाइजरी-केंद्रित मॉडल में कैसे माइग्रेट करता है, बिना कोई बिजनेस खोए। इसके अलावा, निवेशक और इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स इस बात पर भी नज़र रखेंगे कि इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में कॉर्पोरेट लोन ग्रोथ को बनाए रखने में बैंक कितना सफल रहता है। साथ ही, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और टेक्नोलॉजी टूल्स में किया गया निवेश आने वाली तिमाहियों में प्रोडक्टिविटी और लागत दक्षता (cost efficiency) में कैसे तब्दील होता है, यह भी देखने लायक होगा।
