भारत में Specialized Investment Funds का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है। SBI Mutual Fund के इस सेगमेंट ने अपने पहले ही साल में **₹36,000 करोड़** का आंकड़ा पार कर लिया है, जो वेल्थ मैनेजमेंट के बदलते दौर का संकेत है।
भारत के एसेट मैनेजमेंट सेक्टर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। निवेशक अब केवल पारंपरिक म्यूचुअल फंड्स तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि Specialized Investment Funds (SIFs) और पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) की ओर तेजी से शिफ्ट हो रहे हैं। SBI Mutual Fund के हालिया आंकड़े बताते हैं कि उनके स्पेशलाइज्ड फंड्स ने महज एक साल में ₹36,000 करोड़ से ₹37,000 करोड़ का एसेट बेस बना लिया है, जिसमें लगभग 1.5 लाख इन्वेस्टर फोलियो शामिल हैं।
क्यों बदल रही है निवेशकों की पसंद?
पारंपरिक म्यूचुअल फंड्स जहां स्टैंडर्ड स्ट्रैटेजी पर काम करते हैं, वहीं स्पेशलाइज्ड फंड्स अधिक जटिल तरीके अपनाते हैं। इनमें इक्विटी लॉन्ग-शॉर्ट स्ट्रैटेजी और डेरिवेटिव्स का इस्तेमाल करके मार्केट की अस्थिरता को मैनेज किया जाता है। ये तरीके निवेशकों को ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी देते हैं, हालांकि इनमें जोखिम का प्रोफाइल भी अलग होता है।
टेक्नोलॉजी और रेगुलेटरी बदलाव
कंपनियां अब ऑनबोर्डिंग और ट्रांजेक्शन प्रोसेस को फास्ट बनाने के लिए AI और डिजिटल टूल्स का सहारा ले रही हैं, जिससे इनकी पहुंच देश के 25% पिन कोड्स तक हो गई है। सबसे बड़ी चर्चा फिलहाल PMS के ₹50 लाख के मिनिमम इन्वेस्टमेंट बैरियर को लेकर है। उम्मीद है कि जल्द ही 'PMS Lite' या PRIM कैटेगरी आ सकती है, जिससे छोटे निवेशकों के लिए रास्ते खुलेंगे। उद्योग जगत के जानकारों का मानना है कि टेक्नोलॉजी कितनी भी एडवांस क्यों न हो जाए, इस सेगमेंट में ह्यूमन एक्सपर्टाइज की भूमिका हमेशा अहम रहेगी।
