पांच दक्षिण भारतीय निजी बैंकों ने तीन साल में अपने गोल्ड लोन पोर्टफोलियो को 91.2% तक बढ़ाया है, जो जून 2026 तक ₹1.40 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। सोने की बढ़ती कीमतें और मजबूत मांग ने इस ग्रोथ को बढ़ावा दिया है, लेकिन निवेशक एसेट क्वालिटी में तनाव, लोन-टू-वैल्यू नॉर्म्स पर रेगुलेटरी जांच और बढ़ती प्रतिस्पर्धा जैसे जोखिमों पर नजर रख रहे हैं।
ग्रोथ के पीछे की कहानी
दक्षिण भारत के पांच प्रमुख निजी बैंकों - Federal Bank, CSB Bank, South Indian Bank, Karur Vysya Bank, और City Union Bank - का संयुक्त गोल्ड-लोन पोर्टफोलियो जून 2026 तक बढ़कर ₹1.40 लाख करोड़ हो गया है। यह जून 2023 के ₹73,248 करोड़ के मुकाबले 91.2% की भारी बढ़ोतरी है। पिछले 12 महीनों में तो ग्रोथ और भी आक्रामक रही है, इन बैंकों ने ₹36,986 करोड़ के नए गोल्ड लोन बांटे हैं, जो पिछले दो सालों की कुल ग्रोथ से भी ज्यादा है।
क्यों बढ़ी गोल्ड लोन की मांग?
इस ज़बरदस्त ग्रोथ का मुख्य कारण सोने की कीमतों में लगातार आई तेज़ी है। जब सोने का भाव बढ़ता है, तो बैंक पुराने ग्राहकों को ज्यादा लोन दे पाते हैं, भले ही उन्होंने ज्यादा सोना गिरवी न रखा हो। इसके अलावा, बहुत से लोग पर्सनल लोन के मुकाबले गोल्ड लोन को एक सस्ता विकल्प मान रहे हैं, क्योंकि इस पर ब्याज दरें काफी कम होती हैं।
किस बैंक का प्रदर्शन सबसे दमदार?
इन पांचों बैंकों में, Federal Bank के पास सबसे बड़ा पोर्टफोलियो है, जो ₹41,476 करोड़ तक पहुंच गया है। CSB Bank इस सेगमेंट में सबसे ज्यादा केंद्रित है, जहाँ गोल्ड लोन उसके कुल एडवांसेज का लगभग 54% है। जून 2026 तक इसका पोर्टफोलियो ₹21,906 करोड़ तक पहुंच गया। Karur Vysya Bank, South Indian Bank, और City Union Bank ने भी अच्छी ग्रोथ दिखाई है, जिससे इन रीजनल बैंकों की पकड़ इस खास सेगमेंट में मजबूत हुई है।
निवेशकों के लिए चिंता की बात: जोखिम और चुनौतियाँ
जहां इन बैंकों के मुनाफे में इस ग्रोथ से इजाफा हुआ है, वहीं कुछ ऐसे जोखिम भी हैं जिन पर निवेशकों को ध्यान देना चाहिए। एक बड़ी चिंता एसेट क्वालिटी में संभावित तनाव की है। क्रेडिट ब्यूरो CIBIL के आंकड़ों से पता चला है कि जो उधारकर्ता ₹2.5 लाख से ज्यादा का बकाया रखते हैं और जिनके पास एक से ज्यादा एक्टिव गोल्ड लोन अकाउंट हैं, उनमें डिफॉल्ट का खतरा बढ़ रहा है। अगर ये उधारकर्ता समय पर पैसे नहीं चुका पाते, तो बैंकों के NPA (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स) बढ़ सकते हैं।
रेगुलेटरी रिस्क भी एक अहम पहलू है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) गोल्ड लोन मार्केट पर कड़ी नज़र रखता है, खासकर लोन-टू-वैल्यू (LTV) नॉर्म्स पर। यह नॉर्म्स तय करता है कि सोने के गहनों की कीमत का कितना प्रतिशत बैंक लोन के रूप में दे सकते हैं। अगर भविष्य में नियमों को और सख्त किया गया, तो इन बैंकों की ग्रोथ धीमी पड़ सकती है।
इसके अलावा, बाज़ार में कॉम्पिटिशन भी बढ़ रहा है। इन रीजनल बैंकों के अलावा, बड़े प्राइवेट बैंक और नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां (NBFCs) भी डिजिटल प्रोसेस और तेज़ अप्रूवल के ज़रिए गोल्ड लोन मार्केट में अपनी पैठ बढ़ा रही हैं। इसलिए, निवेशकों के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाली तिमाहियों में ये दक्षिणी बैंक अपने प्रॉफिट मार्जिन, क्रेडिट कॉस्ट और बैड लोन को कैसे कंट्रोल करते हैं।
