छोटी नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) के लिए फंड जुटाना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। बड़ी कंपनियों के मुकाबले कमजोर क्रेडिट रेटिंग होने के कारण, ये छोटी कंपनियां अब गोल्ड लोन जैसे सुरक्षित प्रोडक्ट्स की तरफ रुख कर रही हैं ताकि अपनी साख बचाए रख सकें।
भारतीय फाइनेंशियल सेक्टर में इस वक्त एक बड़ा डिवाइड (Divide) देखने को मिल रहा है। जिन बड़ी NBFCs की क्रेडिट रेटिंग AA या उससे ऊपर है, उन्हें डेट मार्केट से फंड जुटाने में कोई परेशानी नहीं हो रही है। वहीं, छोटी कंपनियों को अपनी पूंजी के लिए बैंकों पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिसकी वजह से उनकी बॉरोइंग कॉस्ट (Borrowing Cost) काफी ज्यादा बढ़ गई है।
बैंक बढ़ा रहे हैं दबाव
कभी छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों में NBFCs का दबदबा होता था क्योंकि बैंक वहां तक नहीं पहुंच पाते थे। लेकिन अब कमर्शियल बैंकों ने अपना नेटवर्क इतना बढ़ा लिया है कि इन छोटी कंपनियों का मुकाबला करना कठिन हो गया है। बैंकों के पास सस्ता फंड है, जो इन छोटी NBFCs के बिजनेस मॉडल पर बड़ा दबाव डाल रहा है।
गोल्ड लोन ही सहारा
इस संकट से निकलने के लिए छोटी NBFCs अब अपनी स्ट्रैटेजी बदल रही हैं। अब वे अनसिक्योर्ड पर्सनल लोन के बजाय गोल्ड लोन पर फोकस कर रही हैं। गोल्ड लोन को 'सेफ' माना जाता है क्योंकि इसमें कोलैटरल (Collateral) होता है और डिफॉल्ट की दर भी कम रहती है। इससे कंपनियों को अपना रिस्क प्रोफाइल मैनेज करने में मदद मिलती है।
भविष्य की चुनौतियां
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि सेक्टर के सामने अब कई चुनौतियां हैं। क्रूड ऑयल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और ग्रामीण इलाकों में सूखे जैसे हालात सीधे तौर पर लोन रिकवरी को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, जो कंपनियां रिस्क मैनेजमेंट को बेहतर रखेंगी और अपने प्रॉफिट मार्जिन को बचाए रखेंगी, वही लंबी रेस की घोड़ी साबित होंगी। निवेशकों को इन छोटी NBFCs के 'कॉस्ट ऑफ बॉरोइंग' और एसेट क्वालिटी पर खास नजर रखनी होगी।
