छोटे बैंक GIFT City में बड़ी बैंकों के साथ पार्टनरशिप करके NRI यानी नॉन-रेसिडेंट इंडियंस से FCNR(B) डिपॉजिट्स आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। स्टैंड-बाय लेटर ऑफ क्रेडिट (SBLC) की मदद से, ये बैंक विदेशी ब्रांचों की कमी को पूरा कर डॉलर लिक्विडिटी हासिल करने की फिराक में हैं।
Detailed Coverage
NRI डिपॉजिट्स पर छोटे बैंकों का फोकस
भारत के छोटे और मध्यम दर्जे के प्राइवेट सेक्टर बैंक अपने फॉरेन करेंसी डिपॉजिट्स को बढ़ाने के लिए GIFT City में मौजूद इंटरनेशनल बैंकिंग यूनिट्स (IBUs) के साथ जुड़ने की राह तलाश रहे हैं। इन छोटे बैंकों के पास अक्सर विदेशों में अपनी ब्रांचें नहीं होतीं, इसलिए वे सीधे तौर पर नॉन-रेसिडेंट इंडियंस (NRI) ग्राहकों को फायदा नहीं पहुंचा पाते। इस कमी को दूर करने के लिए, वे गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी (GIFT City) में मजबूत मौजूदगी रखने वाले बड़े फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस के साथ टाई-अप एक्सप्लोर कर रहे हैं।
स्टैंड-बाय लेटर ऑफ क्रेडिट (SBLC) का खेल
इस स्ट्रैटिजी का मुख्य हिस्सा स्टैंड-बाय लेटर ऑफ क्रेडिट (SBLC) का इस्तेमाल है। इसके तहत, एक छोटा बैंक अपने NRI ग्राहक को SBLC जारी करेगा, जो ग्राहक के लिए कोलैटरल (गिरवी) के तौर पर काम करेगा। इस कोलैटरल के आधार पर, ग्राहक GIFT City में मौजूद बड़े बैंक की IBU से लोन ले सकेगा। इस लोन से मिले पैसे को फिर वापस उसी छोटे बैंक के साथ फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट (बैंक) या FCNR(B) डिपॉजिट के रूप में निवेश किया जाएगा। इस तरह, छोटे बैंक उन इंटरनेशनल फंड्स को आकर्षित करने में सक्षम होंगे जो अन्यथा बड़े, ग्लोबल बैंकों की ओर चले जाते।
ब्याज दरें बढ़ाकर लुभाने की कोशिश
जमाकर्ताओं को आकर्षित करने के लिए, कई छोटे और मझोले बैंक FCNR(B) डिपॉजिट्स पर 7% से 7.50% तक की ब्याज दरें ऑफर कर रहे हैं। यह दरें बड़े पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर बैंकों द्वारा ऑफर की जा रही दरों से काफी ज्यादा हैं, जो आमतौर पर 6% के आसपास होती हैं। बड़े बैंकों को इतने आक्रामक रेट ऑफर करने की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि वे अपनी विदेशी ब्रांचों के जरिए ग्राहकों को सीधे फायदा पहुंचा सकते हैं। यही वजह है कि छोटे बैंक इन जटिल, इनडायरेक्ट लेवरेज ऑफर्स की भरपाई के लिए ऊंची ब्याज दरों का सहारा ले रहे हैं।
RBI की स्कीम और बड़ा मौका
यह सब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा शुरू की गई एक खास, लिमिटेड-पीरियड स्कीम के तहत हो रहा है। इस स्कीम का मकसद भारत की डॉलर लिक्विडिटी को मजबूत करना और रुपए को सहारा देना है। इस इनिशिएटिव के तहत RBI पार्टिसिपेटिंग बैंकों के पूरे हेजिंग कॉस्ट को कवर कर रहा है और इन खास डिपॉजिट्स को कैश रिजर्व रेशियो (CRR) और स्टैच्युटरी लिक्विडिटी रेशियो (SLR) की ज़रूरतों से छूट दे रहा है। इससे बैंकों को बड़ी राहत मिली है, क्योंकि वे इन पैसों को अनिवार्य रिजर्व में लॉक किए बिना ज्यादा मात्रा में प्रोडक्टिव एसेट्स में लगा सकते हैं।
कितना हो सकता है कलेक्शन?
इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, बैंकिंग सेक्टर सितंबर 2026 तक FCNR(B) डिपॉजिट्स के जरिए $30 बिलियन से $50 बिलियन तक का नया फंड जुटा सकता है। हालांकि, Equitas Small Finance Bank जैसी संस्थाओं ने GIFT City और पश्चिम एशिया में संभावित पार्टनरशिप पर शुरुआती बातचीत की पुष्टि की है, पर ये अरेंजमेंट्स अभी शुरुआती स्टेज में हैं। जुलाई 2026 के अंत तक कोई भी फाइनल डील तय नहीं हुई है।
निवेशकों के लिए, सबसे अहम बात यह होगी कि ये पार्टनरशिप असल में कैसे एग्जीक्यूट होती हैं और ये छोटे बैंक SBLC-बैक्ड लेंडिंग से जुड़े रिस्क को कैसे मैनेज कर पाते हैं। आने वाले समय में यह देखा जाएगा कि क्या ये बैंक इन डील्स को फाइनल कर पाते हैं और क्या वे अपनी डिपॉजिट बेस में लगातार ग्रोथ के साथ एसेट क्वालिटी को बनाए रख पाते हैं।
