Small Finance Banks (SFBs) ने सिक्योर्ड लेंडिंग (Secured Lending) में अपना दखल बढ़ाना शुरू कर दिया है, जिसमें गोल्ड लोन (Gold Loan) एक बड़ा ग्रोथ इंजन बनकर उभरा है। यह स्ट्रेटेजिक बदलाव बैंकों के उन माइक्रोफाइनेंस पोर्टफोलियो के कारण आया है, जहां खराब लोन (Bad Loans) की दरें लगातार ऊंची बनी हुई हैं। साथ ही, रेगुलेटरी (RBI) की तरफ से अपने बिजनेस में विविधता लाने के दबाव ने भी इस ओर कदम बढ़ाने को मजबूर किया है।
उदाहरण के लिए, ESAF Small Finance Bank के गोल्ड लोन पोर्टफोलियो में पिछले फाइनेंशियल ईयर (FY26) के अंत तक 55% की जोरदार बढ़ोतरी हुई, जो अब ₹8,858 करोड़ तक पहुंच गया है। यह बैंक के कुल एसेट का 39.5% हो गया है, जबकि माइक्रोलोन का शेयर घटकर 39% रह गया है। इससे ESAF का सिक्योर्ड पोर्टफोलियो कुल एसेट का 61% हो गया है। इसी तरह, Jana Small Finance Bank ने भी अपने गोल्ड लोन पोर्टफोलियो में 141% की जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की, जो ₹2,358 करोड़ पर पहुंच गया।
इस बदलाव के पीछे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से मिला अहम सपोर्ट भी है। RBI ने नए फाइनेंशियल ईयर (FY26) से SFBs के लिए मैंडेटरी प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग (PSL) का टारगेट 75% से घटाकर 60% कर दिया है। अनुमान है कि इससे SFBs को करीब ₹40,000 करोड़ की पूंजी मिलेगी, जिसे वे कम जोखिम वाले सिक्योर्ड एसेट्स में लगा सकते हैं।
दूसरी तरफ, SFBs का पारंपरिक माइक्रोफाइनेंस सेगमेंट एक बड़ी चुनौती से गुजर रहा है। मार्च 2026 के अंत तक SFBs का कुल माइक्रोफाइनेंस पोर्टफोलियो पिछले तिमाही के ₹55,700 करोड़ से घटकर ₹51,800 करोड़ रह गया। Utkarsh Small Finance Bank के जॉइंट लायबिलिटी ग्रुप (JLG) पोर्टफोलियो में बड़ी गिरावट देखी गई, जो एक साल पहले ₹9,207 करोड़ से घटकर ₹5,789 करोड़ रह गया, और इसके माइक्रो लोन में NPA (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स) 13.5% था। Suryoday Small Finance Bank का JLG-आधारित माइक्रो लोन भी ₹2,062 करोड़ से घटकर ₹1,512 करोड़ हो गया, और Jana Small Finance Bank के JLG बुक में भी 16.6% का NPA दर्ज किया गया।
भारत में गोल्ड लोन का मार्केट पहले से ही अत्यधिक कॉम्पिटिटिव (Competitive) है। इस ऑर्गनाइज्ड सेक्टर का अनुमानित साइज FY23-24 में करीब ₹7.1 लाख करोड़ था, जो 2027 तक ₹15 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। पब्लिक सेक्टर बैंक इस मार्केट में 63% (मार्च 2024 तक) और 82% (अक्टूबर 2024 तक) की हिस्सेदारी के साथ लीड कर रहे हैं। Muthoot Finance और Manappuram Finance जैसी स्थापित NBFCs की भी रिटेल और सेमी-अर्बन इलाकों में मजबूत पकड़ है।
SFBs इस हाई-ग्रोथ मार्केट में कदम रख रही हैं, जहां अनुमान है कि 2031 तक 11.90% की सालाना ग्रोथ रेट रहेगी। उन्हें प्राइसिंग (Pricing) प्रेशर का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि बड़े खिलाड़ियों के पास फंड की लागत (Cost of Funds) कम होती है। उदाहरण के लिए, ESAF SFB जैसी SFBs का नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) 8.5% और Jana SFB का 7.22% है, जिससे उन्हें बड़े बैंकों के मुकाबले रेट्स मैच करने में मुश्किल हो सकती है।
कुछ SFBs अपने प्रदर्शन में सुधार के संकेत दे रही हैं। ESAF Small Finance Bank ने Q4 FY26 में ₹23.5 करोड़ का नेट प्रॉफिट दर्ज किया, जो पिछले साल के इसी तिमाही के ₹183 करोड़ के घाटे से एक बड़ा उलटफेर है। Jana Small Finance Bank का नेट प्रॉफिट FY26 में 34.90% गिरकर ₹32.64 करोड़ रहा, भले ही रेवेन्यू में ग्रोथ दर्ज की गई। AU Small Finance Bank जैसी संस्थाएं यूनिवर्सल बैंकिंग लाइसेंस की ओर बढ़ रही हैं, जिनका मार्केट कैप ₹78,000 करोड़ से काफी ऊपर है।
इस स्ट्रेटेजिक बदलाव के बावजूद, कुछ SFBs के पोर्टफोलियो का एक बड़ा हिस्सा अभी भी तनावग्रस्त माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में फंसा हुआ है, जहां NPA का स्तर ऊंचा बना हुआ है। ऐसे में बैंकों को पुरानी माइक्रोफाइनेंस समस्याओं को मैनेज करते हुए एक नए, कॉम्पिटिटिव सिक्योर्ड लेंडिंग पोर्टफोलियो को बनाने की दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ेगा। गोल्ड लोन पर बढ़ती निर्भरता, सोने के मूल्य में होने वाले उतार-चढ़ाव से जुड़े जोखिमों को भी बढ़ाती है।
SFBs का सिक्योर्ड लेंडिंग की ओर झुकाव जारी रहने की संभावना है, जो स्थिरता की आवश्यकता और रेगुलेटरी सपोर्ट से प्रेरित है। FY27 के नतीजे इस स्ट्रेटेजिक शिफ्ट की सफलता को मापने में अहम होंगे, खासकर उन बैंकों के लिए जो यूनिवर्सल बैंकिंग स्टेटस हासिल करना चाहते हैं। हालांकि, गोल्ड लोन मार्केट में SFBs की सफलता उनकी कॉम्पिटिटिव क्षमता, फंडिंग कॉस्ट को मैनेज करने और कोलैटरल-आधारित लेंडिंग के अंतर्निहित जोखिमों को प्रभावी ढंग से संभालने पर निर्भर करेगी।
