माइक्रोफाइनेंस संस्थानों (MFIs) के लिए काम करने वाले संगठन Sa-dhan ने अब छोटे MFIs की मदद के लिए 'MFI Accelerator Program' लॉन्च किया है। इस पहल का मकसद छोटे संस्थानों में गवर्नेंस और कामकाज को बेहतर बनाना है, ताकि वे आसानी से फंड जुटा सकें। यह कदम ऐसे समय में आया है जब छोटे MFIs को सरकारी क्रेडिट गारंटी स्कीम का लाभ उठाने में दिक्कतें आ रही हैं और बैंक बड़े, भरोसेमंद संस्थानों को ही लोन देना पसंद कर रहे हैं।
क्या है MFI Accelerator Program?
Sa-dhan, जो कि माइक्रोफाइनेंस संस्थानों (MFIs) के लिए एक सेल्फ-रेगुलेटरी बॉडी है, ने 'MFI Accelerator Program' की शुरुआत की है। इस प्रोग्राम का मुख्य उद्देश्य छोटे सदस्य संस्थानों की ऑपरेशनल और फाइनेंशियल मजबूती को बढ़ाना है। इसमें खासतौर पर गवर्नेंस के स्टैंडर्ड्स, रिस्क मैनेजमेंट और डिजिटल टेक्नोलॉजी को अपनाने पर जोर दिया जाएगा। यह प्रोग्राम कस्टमाइज्ड मेंटरशिप और प्रोफेशनल गाइडेंस देकर छोटे लेंडर्स को और अधिक सक्षम बनाएगा, ताकि वे बैंकों और अन्य फाइनेंशियल संस्थानों से जरूरी फंड आसानी से हासिल कर सकें।
फंड की कमी से जूझ रहे छोटे संस्थान
यह पहल ऐसे समय में आई है जब छोटे माइक्रोफाइनेंस लेंडर्स को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। कई संस्थानों ने बताया है कि सरकार की ₹20,000 करोड़ की क्रेडिट गारंटी स्कीम का फायदा उन तक ठीक से नहीं पहुंच पा रहा है। बैंकों, जो MFIs के लिए फंड का मुख्य जरिया हैं, वे बड़े और बेहतर रेटिंग वाले संस्थानों को प्राथमिकता दे रहे हैं। इस 'फ्लाइट टू सेफ्टी' (सुरक्षा की ओर झुकाव) के कारण छोटे MFIs के लिए मुश्किल खड़ी हो गई है, जबकि अक्सर इन्हीं छोटे संस्थानों को ग्रामीण और कम बैंकिंग सुविधाओं वाले इलाकों में पहुंचने के लिए पूंजी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। Sa-dhan इन फंडिग चुनौतियों को सामने लाने के लिए वित्त मंत्रालय के साथ चर्चा कर रहा है।
बदलते बाजार के संकेत
CRISIL Ratings के आंकड़े बताते हैं कि यह सेक्टर बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। मार्च 2026 तक, MFI के कुल एसेट्स का लगभग 66% बार-बार लोन लेने वाले ग्राहकों का था, जो कि दो साल पहले यानी मार्च 2024 में केवल 53% था। यह ट्रेंड बताता है कि लेंडर्स अब पुराने ग्राहकों को ज्यादा महत्व दे रहे हैं, जिनका रीपेमेंट रिकॉर्ड अच्छा है। इसके अलावा, इन बार-बार लोन लेने वाले ग्राहकों के लिए लोन का औसत साइज भी करीब 15% बढ़कर लगभग ₹59,000 हो गया है। साथ ही, कई MFIs अपने पोर्टफोलियो में विविधता ला रहे हैं, जिसमें गोल्ड लोन और प्रॉपर्टी के बदले लोन जैसे सिक्योर्ड ऑफरिंग्स का हिस्सा पिछले एक साल में 6% से बढ़कर 14% हो गया है।
रेगुलेटरी बदलाव और ग्रामीण क्रेडिट
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के जून 2025 के एक नए नियम के अनुसार, MFIs के लिए क्वालीफाइंग एसेट की सीमा को घटाकर 60% कर दिया गया है। इस बदलाव से संस्थानों को अपने बिजनेस में विविधता लाने के लिए और अधिक लचीलापन मिलेगा। हालांकि, ग्रामीण इलाकों की स्थिति अभी भी चुनौतीपूर्ण है। NABARD के मार्च 2026 के एक सर्वे के अनुसार, केवल औपचारिक क्रेडिट पर निर्भर परिवारों का हिस्सा घटकर 51.2% रह गया है, जो नवंबर 2025 में 58.3% था। यह ग्रामीण वित्तीय तनाव में वृद्धि और अनौपचारिक क्रेडिट स्रोतों पर बढ़ती निर्भरता का संकेत हो सकता है, जो भविष्य में माइक्रोफाइनेंस सेवाओं की मांग को प्रभावित कर सकता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
निवेशकों और हितधारकों के लिए, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह एक्सेलेरेटर प्रोग्राम छोटे MFIs को बैंकों से क्रेडिट दिलाने में कितना सफल होता है और क्या ये संस्थान अपनी क्रेडिट रेटिंग में सुधार कर पाते हैं। 'Credit Guarantee Fund for Micro Units-3' स्कीम का उपयोग भी एक महत्वपूर्ण पहलू रहेगा। अंत में, निवेशकों को RBI की ओर से एसेट क्वालिटी पर किसी भी आगे की नीतिगत बदलावों और औपचारिक बनाम अनौपचारिक क्रेडिट पर निर्भरता के ट्रेंड पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि ये कारक माइक्रोफाइनेंस प्लेयर्स के ग्रोथ और जोखिम प्रोफाइल को सीधे तौर पर प्रभावित करेंगे।
