NRI निवेश आसान बनाएगी SEBI! PMS नियमों में बड़े बदलाव की तैयारी

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
NRI निवेश आसान बनाएगी SEBI! PMS नियमों में बड़े बदलाव की तैयारी

SEBI, यानी भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI), अब पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) के नियमों की समीक्षा कर रहा है। इसका मुख्य मकसद गैर-निवासी भारतीयों (NRIs) के लिए निवेश की प्रक्रिया को आसान बनाना है। भारतीय बाज़ारों में NRIs की दिलचस्पी बढ़ रही है, लेकिन जटिल नियमों और कागजी कार्रवाई के चलते **₹10.5 लाख करोड़** के PMS सेक्टर में उनकी भागीदारी कम बनी हुई है। SEBI जल्द ही एक कंसल्टेशन पेपर जारी करेगा जिसमें इन दिक्कतों को दूर करने के उपाय बताए जाएंगे, ताकि प्रवासी भारतीयों की पूंजी को आकर्षित किया जा सके।

Detailed Coverage

NRIs के लिए निवेश क्यों है मुश्किल?

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) के नियमों की समीक्षा शुरू कर दी है। यह 2020 के बाद इन नियमों का पहला बड़ा मूल्यांकन है। इस कदम का सबसे बड़ा मकसद गैर-निवासी भारतीयों (NRIs) के लिए निवेश के अनुभव को बेहतर बनाना है, जो फिलहाल डोमेस्टिक PMS इंडस्ट्री के तहत मैनेज होने वाली कुल संपत्ति का बहुत छोटा हिस्सा ही रखते हैं।

भारत में आर्थिक ग्रोथ और $143.6 बिलियन के रिकॉर्ड इनवर्ड रेमिटेंस (FY26) के बावजूद, दुनिया भर में फैले भारतीय समुदाय की पेशेवर रूप से मैनेज्ड डोमेस्टिक पोर्टफोलियो में भागीदारी अभी भी कम है। इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि इसकी मुख्य वजह NRIs की रुचि की कमी नहीं, बल्कि निवेश शुरू करने की बेहद जटिल प्रक्रिया है। फिलहाल, निवेशकों को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर्स रेगुलेटरी अथॉरिटी (IFSCA) जैसी कई संस्थाओं के बीच तालमेल बिठाना पड़ता है।

इस प्रक्रिया में कागजी कार्रवाई का बोझ भी काफी ज्यादा है। इसमें खास NRI बैंक खातों, डीमैट खातों को इंटीग्रेट करने, फिजिकल डॉक्यूमेंटेशन और जटिल अटेस्टेशन (Attestation) प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है। इतना ही नहीं, कई सर्विस प्रोवाइडर अमेरिका (US) और कनाडा जैसे देशों के क्लाइंट्स को ऑनबोर्ड करने से कतराते हैं, क्योंकि फॉरेन अकाउंट टैक्स कंप्लायंस एक्ट (FATCA) से जुड़ी कंप्लायंस कॉस्ट (Compliance Cost) काफी ज्यादा है। इन बाधाओं के कारण, हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (HNIs) के लिए यह प्रक्रिया वैश्विक मानकों की तुलना में लंबी और महंगी हो जाती है।

इंडस्ट्री की मांगें और रणनीति

एसोसिएशन ऑफ पोर्टफोलियो मैनेजर्स इन इंडिया (APMI) के नेतृत्व में, इंडस्ट्री के सदस्य नियामक के साथ मिलकर सुधारों का सुझाव दे रहे हैं। इंडस्ट्री एक ऐसे एकीकृत फ्रेमवर्क की वकालत कर रही है जो NRIs के लिए पूंजी के सुगम प्रवाह (Smoother Capital Flows) और आसान पहुंच सुनिश्चित करे। लक्ष्य एक ऐसी डिजिटल और बिना रुकावट वाली व्यवस्था की ओर बढ़ना है, जो इन निवेशकों को दुनिया के अन्य बाज़ारों में मिलने वाले परिष्कृत निवेश अनुभवों के समान हो।

प्रवासी भारतीयों के बीच हाइब्रिड इन्वेस्टमेंट स्ट्रेटेजी (Hybrid Investment Strategies) की मांग भी बढ़ रही है। निवेशक ऐसी पेशेवर मैनेजमेंट की तलाश में हैं जो भारतीय ग्रोथ स्टोरी के अवसरों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों और करेंसी डाइवर्सिफिकेशन (Currency Diversification) तक पहुंच के साथ जोड़ सके। APMI ने नियामक को ग्लोबल बेंचमार्किंग स्टडीज (Global Benchmarking Studies) भी सौंपी हैं, ताकि यह दिखाया जा सके कि अन्य देश इन क्रॉस-बॉर्डर निवेश प्रवाहों को कितनी प्रभावी ढंग से प्रबंधित करते हैं।

निवेशकों के लिए आगे क्या?

हालांकि सरकार ने 2026 के बजट में लिस्टेड कंपनियों में NRIs के लिए निवेश सीमा बढ़ाने और पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट स्कीम (Portfolio Investment Scheme) को मजबूत करने जैसे कदम उठाए थे, लेकिन इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि इन उपायों से अभी तक नए PMS खातों के खुलने में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है। अगला महत्वपूर्ण अपडेट SEBI का कंसल्टेशन पेपर होगा, जिसमें नियामक बदलावों के लिए विशिष्ट प्रस्तावों की रूपरेखा तैयार होने की उम्मीद है। निवेशकों को इस पेपर के विवरणों पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यह तय करेगा कि मौजूदा कंप्लायंस संबंधी बाधाओं को किस हद तक कम किया जाएगा और नई, सुव्यवस्थित ऑनबोर्डिंग प्रक्रियाओं को कितनी तेजी से लागू किया जा सकेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.