भारतीय शेयर बाज़ार में मर्चेंट बैंकरों की संख्या तेजी से बढ़ी है। SEBI (सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया) के साथ पंजीकृत मर्चेंट बैंकरों की कुल संख्या अब **244** हो गई है, जो साल 2000 के बाद का सबसे बड़ा आंकड़ा है। यह उछाल प्राइमरी मार्केट (Primary Market) में बढ़ती गतिविधि को दर्शाता है।
IPO की धूम और मर्चेंट बैंकरों की चांदी
FY26 में मेनबोर्ड IPOs के ज़रिए कंपनियों ने ₹1.8 लाख करोड़ से ज़्यादा की रकम जुटाई, वहीं SME सेगमेंट में 254 कंपनियों ने करीब ₹11,000 करोड़ जुटाए। इस रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन के बाद मर्चेंट बैंकरों की संख्या में भी भारी इज़ाफ़ा देखा गया है। यह ट्रेंड अब सिर्फ बड़े शहरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अहमदाबाद, जयपुर और भुवनेश्वर जैसे शहरों से भी नए मर्चेंट बैंकर सामने आ रहे हैं।
इस बढ़ोतरी का सीधा असर सेक्टर की कमाई पर भी दिख रहा है। महामारी से पहले के पांच सालों में जहां लीड मैनेजर की औसत सालाना फीस ₹400 करोड़ थी, वहीं FY26 में यह बढ़कर ₹4,300 करोड़ से ज़्यादा हो गई।
रेगुलेटर की पैनी नज़र और निवेशक सुरक्षा
यह स्थिति 1990 के दशक के IPO बूम की याद दिलाती है, जब FY96 में 1,300 से ज़्यादा IPO आए थे। हालांकि, उस दौर में फंड जुटाने के बाद कुछ कंपनियां गायब भी हो गई थीं। ऐसे जोखिमों से बचने के लिए, SEBI ने कैटेगरी-I मर्चेंट बैंकरों के लिए न्यूनतम नेट वर्थ (Net Worth) की ज़रूरत को चरणबद्ध तरीके से बढ़ाने का फैसला किया है।
इन कंपनियों को मार्च 2027 तक अपनी नेट वर्थ ₹25 करोड़ और मार्च 2028 तक ₹50 करोड़ करनी होगी। इस कदम का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि केवल आर्थिक रूप से मज़बूत कंपनियां ही पब्लिक ऑफरिंग का प्रबंधन करें, जिससे निवेशकों को सुरक्षा मिल सके।
