भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की एक खास स्कीम के तहत विदेशी मुद्रा के रूप में करीब **$1.9 अरब (यानी ₹16,000 करोड़ से ज़्यादा)** की रकम जुटाई है। यह रकम सरकारी और प्राइवेट बैंकों में सबसे ज़्यादा है, जो SBI की मजबूत ग्लोबल पहुंच को दिखाता है।
RBI की स्कीम से SBI ने मारी बाज़ी
भारतीय स्टेट बैंक (SBI) विदेशी मुद्रा जुटाने के मामले में सबसे आगे निकल गया है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की एक खास स्कीम के तहत, SBI ने करीब $1.9 अरब (लगभग ₹16,000 करोड़) विदेशी मुद्रा जुटाई है। यह रकम बॉन्ड इश्यू और फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट (FCNR-B) डिपॉजिट्स का मिला-जुला असर है। SBI के 240 से ज़्यादा इंटरनेशनल ऑफिस की मजबूत नेटवर्क के ज़रिए यह फंड जुटाया गया है, जो नॉन-रेसिडेंट भारतीयों से कैपिटल आकर्षित करने में मददगार साबित हुआ है।
अन्य बैंकों के मुकाबले SBI का दबदबा
जब बात विदेशी मुद्रा जुटाने की आती है, तो SBI का प्रदर्शन दूसरे बड़े भारतीय बैंकों से काफी बेहतर रहा। सरकारी बैंकों में, बैंक ऑफ बड़ौदा ने $273 मिलियन जुटाए, जबकि केनरा बैंक और पंजाब नेशनल बैंक (PNB) को $80 मिलियन ही मिले। प्राइवेट बैंकों में, HDFC बैंक ने $750 मिलियन और Axis Bank ने $800 मिलियन जुटाए हैं, जो उन्होंने गिफ्ट सिटी में स्थित अपने इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर (IFSC) यूनिट्स के ज़रिए किए हैं।
RBI की यह स्कीम कैसे काम करती है?
RBI की यह स्कीम बैंकों को खास राहत देती है। इसके तहत, 3 से 5 साल की मैच्योरिटी वाले फॉरेन-करेंसी डिपॉजिट्स की हेजिंग कॉस्ट (Hedging Costs) को RBI वहन करेगा। इससे बैंकों को फंड जुटाने में आसानी होती है। कुछ बैंकों ने तो खास स्ट्रक्चर्ड प्रोडक्ट्स भी लॉन्च किए हैं। उदाहरण के लिए, बैंक ग्राहकों को 5.8% की ब्याज दर पर लोन की सुविधा दे रहे हैं, अगर वे $1 मिलियन अपने FCNR-B डिपॉजिट्स में जमा करते हैं, जिस पर उन्हें करीब 6.5% का रिटर्न मिलता है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
निवेशकों के लिहाज़ से, इस फंड जुटाने का मतलब है कि बैंकों के पास विदेशी मुद्रा की लिक्विडिटी (Liquidity) बढ़ेगी, जो उनके लेंडिंग ऑपरेशन्स (Lending Operations) को सपोर्ट करेगा और फंड के स्थिर स्रोत बनेंगे। हालांकि, जुलाई में इस स्कीम की वजह से बैंकों की फंड कॉस्ट थोड़ी बढ़ी थी, लेकिन अब इससे वे हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (High-Net-Worth Individuals) के लिए नए और बेहतर डिपॉजिट प्रोडक्ट्स बना पा रहे हैं। सरकार भी चाहती है कि पब्लिक सेक्टर बैंक, भारतीय मूल के लोगों (Indian Diaspora) से ज़्यादा जुड़ें, और यह उसी दिशा में एक कदम है।
आगे, बाज़ार के जानकारों की नज़र इस पर रहेगी कि क्या यह इनफ्लो (Inflow) बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (Net Interest Margins) को बेहतर बनाता है, या इन फॉरेन करेंसी प्रोडक्ट्स को बनाए रखने की लागत फायदों पर भारी पड़ती है। आने वाले क्वार्टरली रिजल्ट्स में FCNR-B डिपॉजिट्स की ग्रोथ और RBI की स्कीम के आगे बढ़ने पर यह इनफ्लो कितना टिकाऊ रहता है, यह देखना अहम होगा।
