भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की रिसर्च विंग ने आगाह किया है कि बैंकों में क्रेडिट ग्रोथ (18.6%) डिपॉजिट ग्रोथ (13.3%) से कहीं ज़्यादा तेज़ी से बढ़ रही है। इस वजह से **5.3%** का अंतर पैदा हो गया है। भू-राजनीतिक जोखिम और सप्लाई शॉक इस ट्रेंड को बढ़ा रहे हैं, जिससे बैंकों की लिक्विडिटी मैनेजमेंट पर दबाव आ सकता है, भले ही बैंकिंग सेक्टर अभी भी मज़बूत है।
क्रेडिट-डिपॉजिट गैप के पीछे की वजह?
भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के इकोनॉमिक रिसर्च डिपार्टमेंट ने अपनी एक रिपोर्ट में बैंकों के लिए एक चिंताजनक तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के मुताबिक, 30 जून 2026 तक के पखवाड़े में, बैंकों द्वारा दिए जाने वाले लोन (क्रेडिट) में 18.6% की बढ़ोतरी हुई, जबकि जमा (डिपॉजिट) में सिर्फ़ 13.3% की ही रफ़्तार देखी गई। यह 5.3% का अंतर बैंकों की लिक्विडिटी मैनेजमेंट के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर सकता है।
बाहरी दबाव का असर
इस ट्रेंड के पीछे भू-राजनीतिक जोखिम (Geopolitical Risks) और सप्लाई शॉक (Supply Shocks) जैसे बाहरी कारक हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जैसे मुद्दे क्रेडिट ग्रोथ पर डिपॉजिट ग्रोथ की तुलना में ज़्यादा तेज़ असर डालते हैं। जहां डिपॉजिट ग्रोथ पर महंगाई और आर्थिक कारणों का असर ज़्यादा होता है, वहीं फिलहाल क्रेडिट की मांग डिपॉजिट जुटाने की रफ़्तार से ज़्यादा बनी हुई है। यह स्थिति 2004-05 के फाइनेंशियल ईयर जैसी है, जब तेल की कीमतों में तेज़ी ने क्रेडिट-डिपॉजिट के संतुलन को प्रभावित किया था।
बैंकिंग सेक्टर की मज़बूती
लिक्विडिटी पर दबाव के बावजूद, भारतीय बैंकिंग सिस्टम फिलहाल मज़बूत स्थिति में है। बैंकों के कैपिटल-टू-रिस्क-वेटेड एसेट रेशियो (CRAR) काफी अच्छे हैं और नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) भी निचले स्तर पर बने हुए हैं। यह मज़बूती बाहरी सप्लाई की वजह से आने वाले आर्थिक तनाव से निपटने में मदद करती है।
बैंकों के लिए ज़रूरी कदम
फिलहाल, उपभोक्ता मांग (Consumer Demand) और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च तेज़ है। लेकिन, रिसर्च इस बात पर ज़ोर देती है कि बैंकों को सतर्क रहने की ज़रूरत है। स्थिरता बनाए रखने के लिए, बैंकों को अपनी लिक्विडिटी मैनेजमेंट स्ट्रेटेजी को बेहतर बनाना चाहिए। उन्हें बैलेंस शीट अनुशासन (Balance Sheet Discipline) पर ध्यान देना चाहिए ताकि क्रेडिट की तेज़ ग्रोथ उपलब्ध फंड की कमी से आगे न निकल जाए। साथ ही, लंबी अवधि की ऊर्जा स्वतंत्रता (Energy Independence) को भी अहम बताया गया है, जो सप्लाई शॉक से बचाने में मदद करती है। निवेशकों को बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (Net Interest Margins) और डिपॉजिट जुटाने की कोशिशों पर नज़र रखनी चाहिए, क्योंकि ये बताएंगे कि बैंक इस क्रेडिट-डिपॉजिट के अंतर को कितनी अच्छी तरह संभाल पा रहे हैं।
