देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक SBI ने FY2018 से FY2026 के बीच NCLT के जरिए सुलझाए गए **309** खातों में **₹1 लाख करोड़** से अधिक का हेयरकट स्वीकार किया है। इसके अलावा, बैंक ने **₹1.51 लाख करोड़** के बड़े कॉर्पोरेट लोन को राइट-ऑफ किया है।
भारी नुकसान और रिकवरी का गणित
RTI के जरिए मिली जानकारी से पता चला है कि SBI ने NCLT में चल रहे 309 मामलों में अपने दावों का महज 33% हिस्सा ही रिकवर कर पाया है। 'हेयरकट' का सीधा मतलब है बैंक द्वारा उस रकम को छोड़ना, जिसे वसूलना नामुमकिन था, जो सीधे बैंक के पोर्टफोलियो पर घाटे के रूप में दर्ज होता है।
टेक्निकल राइट-ऑफ का बोझ
केवल NCLT ही नहीं, बैंक ने बड़े कॉर्पोरेट कर्जदारों के मामले में भी सख्त कदम उठाए हैं। FY2017 से FY2026 के दौरान, ₹100 करोड़ से ज्यादा के एक्सपोजर वाले मामलों में ₹1,51,857 करोड़ का टेक्निकल राइट-ऑफ किया गया। इन मामलों में रिकवरी की दर और भी चिंताजनक रही, जो सिर्फ 14% (₹20,838 करोड़) के आसपास सिमट कर रह गई।
बैलेंस शीट पर क्या है असर?
इतने बड़े राइट-ऑफ के बावजूद, बैंक की मौजूदा हेल्थ काफी मजबूत दिखती है। 31 मार्च 2026 तक, SBI का Gross NPA घटकर 1.49% और Net NPA महज 0.39% रह गया है। बीते एक दशक में की गई भारी प्रोविजनिंग और राइट-ऑफ ने आज बैंक की बैलेंस शीट को काफी हद तक क्लीन कर दिया है।
पारदर्शिता पर सवाल
बैंक ने कमर्शियल कॉन्फिडेंशियलिटी का हवाला देते हुए उन कर्जदारों के नाम बताने से इनकार कर दिया है, जिनके लोन सेटल किए गए हैं। निवेशकों के लिए यह एक चुनौती है, क्योंकि वे यह नहीं जान सकते कि अतीत में रिस्क मैनेजमेंट में कहां चूक हुई थी। फिलहाल, बाजार की नजर इस बात पर है कि बैंक अपने मौजूदा लो-NPA लेवल को कैसे मेंटेन रखता है और क्या भविष्य में रिकवरी की रफ्तार बढ़ती है या नहीं।
