SBI म्यूचुअल फंड (SBI Mutual Fund) एक बार फिर से प्राइवेट क्रेडिट और अनलिस्टेड इक्विटी (unlisted equity) में निवेश शुरू करने जा रहा है। कंपनी अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (Alternative Investment Funds) के ज़रिए यह बिज़नेस फिर से शुरू कर रही है, क्योंकि अब रेगुलेटरी (regulatory) मामले पूरी तरह से साफ हो गए हैं। इस कदम से देश के सबसे बड़े एसेट मैनेजर (asset manager) को हाई-यील्ड मिड-मार्केट लेंडिंग (high-yield mid-market lending) स्पेस में उतरने का मौका मिलेगा, ठीक वैसे ही जैसे HDFC Asset Management जैसे दूसरे बड़े फंड हाउस कर चुके हैं।
रेगुलेटरी क्लैरिटी और नई रणनीति
SBI म्यूचुअल फंड, जो ₹13 लाख करोड़ से ज़्यादा का एसेट मैनेज करता है, अब अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (AIFs) के ज़रिए प्राइवेट क्रेडिट और अनलिस्टेड इक्विटी में इन्वेस्टमेंट करेगा। फंड हाउस ने हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा उठाए गए कुछ सवालों का जवाब दिया है, जिसके बाद यह फैसला लिया गया है। पहले RBI की चिंताओं के चलते SBI म्यूचुअल फंड ने प्राइवेट क्रेडिट में अपनी एक्टिविटीज़ को रोक दिया था, खासकर पैरेंट ऑर्गनाइजेशन, भारतीय स्टेट बैंक (State Bank of India), के साथ संभावित ओवरलैप (overlap) को लेकर।
RBI की तरफ से मिली हरी झंडी के बाद, SBI म्यूचुअल फंड ने इन एक्टिविटीज़ को फिर से शुरू करने का फैसला किया है। प्राइवेट क्रेडिट में सीधे कंपनियों को लोन दिया जाता है, खासकर उन कंपनियों को जिन्हें पारंपरिक बैंकों से लोन मिलना मुश्किल होता है। SBI म्यूचुअल फंड द्वारा इन्हें कैटेगरी-II AIFs के तौर पर स्ट्रक्चर करने का मकसद मिड-मार्केट कंपनियों को ग्रोथ कैपिटल (growth capital) देना है। माना जा रहा है कि फंड हाउस अगले एक से दो महीनों के अंदर इन नए प्रोडक्ट्स को लॉन्च कर सकता है। प्राइवेट क्रेडिट और अनलिस्टेड इक्विटी के अलावा, कंपनी रियल एस्टेट सेक्टर में भी नए मौके तलाश रही है, हालांकि इस पर अभी कोई फाइनल फैसला नहीं हुआ है।
मार्केट की डिमांड और निवेशकों का प्रोफाइल
भारत में प्राइवेट क्रेडिट का सेक्टर तेज़ी से बढ़ा है। अनुमान है कि 2025 के अंत तक इसका कुल मार्केट साइज़ $25 बिलियन तक पहुंच जाएगा। पिछले पांच सालों में इस सेक्टर का साइज़ दोगुना हो गया है, क्योंकि कंपनियाँ अपने विस्तार और इनोवेशन के लिए नए फाइनेंसिंग ऑप्शन तलाश रही हैं। ये इन्वेस्टमेंट प्रोडक्ट्स आमतौर पर हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (high-net-worth individuals) के लिए होते हैं, जिनमें कम से कम ₹1 करोड़ का कमिटमेंट ज़रूरी होता है। इन इन्वेस्टमेंट्स में पब्लिक मार्केट की तुलना में ज़्यादा रिस्क (risk) होता है, क्योंकि ये अनलिस्टेड या मिड-मार्केट एंटिटीज़ को लोन देती हैं जहाँ लिक्विडिटी (liquidity) कम हो सकती है।
कॉम्पिटिशन और ग्रोथ की राह
SBI म्यूचुअल फंड का यह कदम इंडस्ट्री के उस ट्रेंड के साथ जुड़ता है जहाँ बड़े एसेट मैनेजर पब्लिक मार्केट के अलावा दूसरे सेक्टर्स में भी डाइवर्सिफाई कर रहे हैं। HDFC Asset Management Company जैसे कॉम्पिटिटर्स (competitors) पहले ही इस खास लेंडिंग स्पेस में अपनी मौजूदगी बना चुके हैं। SBI म्यूचुअल फंड के लिए, यह एक्सपैंशन (expansion) एक एक्स्ट्रा रेवेन्यू स्ट्रीम (revenue stream) खोलेगा, क्योंकि वे इन कॉम्प्लेक्स इन्वेस्टमेंट स्ट्रक्चर्स को मैनेज करने के लिए फीस चार्ज करेंगे। जहाँ प्राइवेट क्रेडिट में निवेशकों को अक्सर 14-16% की दर से अच्छा रिटर्न मिल सकता है, वहीं इन फंड्स का परफॉरमेंस (performance) काफी हद तक फंड हाउस की क्रेडिट रिस्क मैनेजमेंट (credit risk management) क्षमता और मिड-मार्केट सेगमेंट में अच्छे बरोअर्स (borrowers) चुनने की काबिलियत पर निर्भर करेगा। निवेशकों को फंड हाउस के नए प्रोडक्ट्स और उनके स्केल पर नज़र रखनी चाहिए।
