भारत के दो सबसे बड़े बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) और HDFC Bank, विदेशी बाज़ारों से **$1.7 बिलियन** (लगभग ₹14,000 करोड़ से ज़्यादा) का लोन जुटा रहे हैं। यह कदम डॉलर रिज़र्व को मजबूत करने के लिए उठाया जा रहा है, जिसका मुख्य कारण RBI की एक खास स्कीम है जो विदेशी करेंसी डिपॉजिट पर लगने वाले हेजिंग के खर्च को कवर करती है।
SBI और HDFC Bank की विदेशी फंड जुटाने की स्ट्रैटेजी
भारतीय बैंकिंग सेक्टर के दो दिग्गज, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) और HDFC Bank, एक बड़ी विदेशी करेंसी लोन फैसिलिटी के ज़रिए कुल $1.7 बिलियन (लगभग ₹14,000 करोड़ से ज़्यादा) जुटाने की तैयारी में हैं। इस फंड का इस्तेमाल बैंकों के डॉलर रिज़र्व को और मजबूत करने के लिए किया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की एक खास स्कीम अहम भूमिका निभा रही है, जो विदेशी मुद्रा जमा पर लगने वाली हेजिंग (hedging) की लागत को कवर करती है।
SBI का $1 बिलियन का लोन
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, जो भारत का सबसे बड़ा बैंक है, $1 बिलियन का पांच साल का लोन जुटा रहा है। इस डील को अंतरराष्ट्रीय बैंक HSBC और MUFG मैनेज कर रहे हैं। आने वाले महीने में इसे और बड़े बैंकों के सिंडिकेट (syndicate) को पेश करने की योजना है। यह SBI की हालिया विदेशी फंड जुटाने की कई कोशिशों का हिस्सा है, जिसमें जून के अंत में $300 मिलियन का बॉन्ड इशू और $200 मिलियन का 2029 में मैच्योर होने वाले डेट का एक और इशू शामिल है।
HDFC Bank का स्ट्रक्चर
दूसरी ओर, HDFC Bank भी लगभग $700 मिलियन जुटा रहा है। यह लोन 3.5 साल का होगा और इसमें Standard Chartered बैंक के साथ-साथ CTBC जैसे ताइवानी संस्थान भी शामिल हैं। इस फंड की कीमत SOFR (Secured Overnight Financing Rate) से 110 बेसिस पॉइंट्स ज़्यादा रखी गई है। यह एक क्लब लोन (club loan) के तौर पर स्ट्रक्चर किया गया है, जिसका मतलब है कि अगर और बैंक इसमें शामिल होते हैं तो HDFC Bank की यह फैसिलिटी $1 बिलियन तक बढ़ सकती है।
RBI की स्कीम का क्या है महत्व?
इन बैंकों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण RBI की फॉरेन करेंसी नॉन-रेज़िडेंट (FCNR) डिपॉजिट्स से जुड़ा नियम है। इस स्कीम के तहत, RBI इन तीन से पांच साल की नई जमाओं पर करेंसी रिस्क की हेजिंग का पूरा खर्च उठा रहा है। आम तौर पर, विदेशी फंड जुटाने में करेंसी के उतार-चढ़ाव का रिस्क होता है, जिसके लिए महंगी हेजिंग की ज़रूरत पड़ती है। इस लागत को हटाकर, RBI बैंकों के लिए विदेशी पूंजी आकर्षित करने की राह आसान बना रहा है।
यह स्ट्रैटेजी बैंकों को अपनी विदेशी मुद्रा जमा के बेस को बढ़ाने और विदेशी ग्राहकों को बेहतर सपोर्ट देने में मदद करती है, बिना हेजिंग के भारी खर्च से अपने घरेलू प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित किए। हालांकि, इससे लिक्विडिटी (liquidity) बढ़ेगी, लेकिन शेयरधारकों के लिए मुख्य निगरानी का बिंदु यह होगा कि RBI का यह सपोर्ट खत्म होने के बाद इन देनदारियों की लॉन्ग-टर्म लागत क्या होगी। निवेशकों को यह भी देखना होगा कि बैंक इन फंड्स को कितनी अच्छी क्वालिटी वाली विदेशी एसेट्स में निवेश करते हैं और अपने सामान्य इंटरेस्ट स्प्रेड (interest spread) को बनाए रखते हैं। आने वाले हफ्तों में जैसे-जैसे ये फैसिलिटीज फाइनल होंगी, फंड की लागत और कुल राशि ग्लोबल बैंकिंग सेक्टर में भारतीय वित्तीय कर्ज के प्रति रुचि का और बेहतर संकेत देगी।
