SBI Funds Management के ₹9,813 करोड़ के IPO में निवेशकों का पैसा रिकॉर्ड तोड़ बरस रहा है। बोलियों का आंकड़ा ₹2.98 लाख करोड़ तक पहुंच गया है, जो कि एक बड़ा कीर्तिमान है। मजबूत संस्थागत मांग (Institutional Demand) ने इसे **41.66** गुना सब्सक्राइब कराया, जिससे एसेट मैनेजमेंट कंपनी का वैल्यूएशन लगभग **₹1.17 लाख करोड़** हो गया है।
SBI Funds Management का इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) 16 जुलाई, 2026 को समाप्त हुआ, जिसमें निवेशकों ने जमकर पैसा लगाया। ₹9,813 करोड़ के इस इश्यू में कुल ₹2.98 लाख करोड़ की बोलियां आईं। ऑफर पर मौजूद 12.45 करोड़ शेयरों के मुकाबले निवेशकों ने 518.93 करोड़ इक्विटी शेयरों के लिए ऑर्डर दिए, जिससे यह कुल मिलाकर 41.66 गुना सब्सक्राइब हुआ।
संस्थागत निवेशकों का दबदबा
इस इश्यू की सफलता के पीछे सबसे बड़ा हाथ क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स (QIBs) का रहा, जिन्होंने 140.11 गुना तक सब्सक्रिप्शन हासिल किया। वहीं, रिटेल निवेशकों की तरफ से 3.59 गुना और नॉन-इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (NIIs) की तरफ से 22.51 गुना सब्सक्रिप्शन देखा गया। इस भारी मांग से साफ है कि अबू धाबी इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी (Abu Dhabi Investment Authority) और GIC जैसे बड़े ग्लोबल फंड्स का इस पर पूरा भरोसा है, जिन्होंने एंकर राउंड में भी हिस्सा लिया था।
कंपनी का वैल्यूएशन
यह IPO पूरी तरह से ऑफर फॉर सेल (Offer for Sale) था, जिसका मतलब है कि कंपनी के बिजनेस ऑपरेशन्स में कोई नया पैसा नहीं आएगा। पैसा बेचने वाले शेयरधारकों, यानी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (State Bank of India) और Amundi India Holding को मिलेगा। ₹574 प्रति शेयर के अपर प्राइस बैंड पर कंपनी का वैल्यूएशन करीब ₹1.17 लाख करोड़ आंका गया है। इस वैल्यूएशन के साथ, यह भारतीय एसेट मैनेजमेंट कंपनियों में सबसे बड़ी कंपनियों में से एक बन गई है। पब्लिक इश्यू खुलने से पहले, कंपनी ने एंकर निवेशकों से ₹2,663 करोड़ जुटाए थे, जिन्होंने ₹574 प्रति शेयर के भाव पर खरीदारी की थी।
सेक्टर और कॉम्पिटिशन
SBI Funds Management एसेट मैनेजमेंट सेक्टर में काम करती है, जहां HDFC AMC, Nippon Life India Asset Management और ICICI Prudential AMC जैसे बड़े लिस्टेड प्लेयर्स मौजूद हैं। हालांकि IPO में भारी मांग देखी गई है, निवेशकों को यह समझना होगा कि एसेट मैनेजमेंट कंपनियों का प्रदर्शन स्टॉक मार्केट की चाल और म्यूचुअल फंड में आने वाले पैसे से सीधा जुड़ा होता है। भविष्य में कंपनी की ग्रोथ इस बात पर निर्भर करेगी कि वह बैंक-समर्थित और स्वतंत्र फंड हाउसेज के मुकाबले अपनी मार्केट हिस्सेदारी बनाए रख पाती है या नहीं। मैन्युफैक्चरिंग या इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के विपरीत, एसेट मैनेजर्स को कम कैपिटल खर्च की जरूरत होती है, जिससे अक्सर उनका प्रॉफिट मार्जिन ज्यादा होता है, लेकिन मार्केट सेंटिमेंट के आधार पर उनके रेवेन्यू में उतार-चढ़ाव आ सकता है।
अब कंपनी स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टिंग की तैयारी कर रही है, ऐसे में निवेशक अगले चरण में शेयर अलॉटमेंट और लिस्टिंग की तारीख का इंतजार करेंगे। लिस्टिंग के बाद, बाजार कंपनी की एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (Assets Under Management) को बनाए रखने और रेगुलेटरी बदलावों से निपटने की क्षमता पर बारीकी से नजर रखेगा, जिसका असर म्यूचुअल फंड फीस और डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल पर पड़ सकता है।
