SBI अर्थशास्त्रियों का सुझाव: इंफ्रास्ट्रक्चर लोन को प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग में शामिल करें

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
SBI अर्थशास्त्रियों का सुझाव: इंफ्रास्ट्रक्चर लोन को प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग में शामिल करें

भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के अर्थशास्त्रियों ने प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग (PSL) के नियमों में बड़े बदलाव का सुझाव दिया है। उनकी ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि इंफ्रास्ट्रक्चर लोन को PSL के तहत लाना चाहिए, ताकि इस सेक्टर में फंड की कमी को पूरा किया जा सके। इस प्रस्ताव का मकसद बैंकों को राष्ट्रीय विकास के लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करना है।

प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग (PSL) में क्यों हो बदलाव?

SBI के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मौजूदा PSL ढांचे में एक बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव की जरूरत है। भारत में बैंकों को अपनी नेट बैंक क्रेडिट का 40% हिस्सा एग्रीकल्चर और छोटे व्यवसायों जैसे खास सेक्टरों में लोन के तौर पर देना अनिवार्य होता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कई बैंकों को इन लक्ष्यों को पूरा करने में मुश्किल होती है, जिसका अंदाजा PSL सर्टिफिकेट के बड़े मार्केट से लगाया जा सकता है। इन सर्टिफिकेट के जरिए बैंक अपने लक्ष्य पूरे करने के लिए दूसरों से क्रेडिट खरीद सकते हैं। 2018 में ₹1.8 लाख करोड़ का यह मार्केट 2025 तक बढ़कर ₹12.2 लाख करोड़ हो गया है।

इंफ्रास्ट्रक्चर को मिलेगा बूस्ट?

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत को 2047 तक अपने इंफ्रास्ट्रक्चर लक्ष्यों को पूरा करने के लिए भारी मात्रा में लॉन्ग-टर्म कैपिटल की जरूरत है। चूंकि कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट अभी इतना मजबूत नहीं है कि वह सारा फंड जुटा सके, ऐसे में बैंक लोन ही मुख्य जरिया बनता है। SBI के अर्थशास्त्री मानते हैं कि अगर इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को PSL के तहत लाया जाता है, तो बैंक उन्हें फंड करने के लिए और ज्यादा उत्साहित होंगे। एक और विकल्प यह है कि इंफ्रास्ट्रक्चर लोन को नेट बैंक क्रेडिट की गणना से पूरी तरह बाहर रखा जाए, जिससे बैंकों के लिए अपने बाकी PSL लक्ष्यों को पूरा करना आसान हो जाएगा।

हाउसिंग और एनर्जी के लिए बड़े बदलावों के प्रस्ताव

इंफ्रास्ट्रक्चर के अलावा, रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि मौजूदा हाउसिंग, एजुकेशन और रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर के लिए लोन लिमिट्स बढ़ती लागतों के हिसाब से पुरानी पड़ गई हैं।

  • हाउसिंग: मेट्रो शहरों में PSL क्लासिफिकेशन के लिए लोन लिमिट बढ़ाकर ₹1 करोड़ और अन्य जगहों पर ₹75 लाख करने का सुझाव दिया गया है।
  • एजुकेशन: हायर एजुकेशन की लागत को बेहतर ढंग से सपोर्ट करने के लिए PSL के तहत लोन लिमिट को दोगुना कर ₹50 लाख करने की सिफारिश की गई है।
  • रिन्यूएबल एनर्जी: इस सेक्टर के लिए प्रस्ताव और भी आक्रामक है, जिसमें कहा गया है कि PSL लोन के तौर पर योग्य होने के लिए प्रोजेक्ट कॉस्ट की सीमा बढ़ाकर ₹100 करोड़ की जा सकती है। इसके अलावा, इंडिविजुअल रूफटॉप सोलर प्रोजेक्ट्स के लिए लिमिट को बढ़ाकर ₹2 करोड़ किया जा सकता है, जो मौजूदा ₹10 लाख की कैप से काफी ज्यादा है।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये सुझाव फिलहाल एक रिसर्च रिपोर्ट का हिस्सा हैं और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की नीति में बदलाव का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। अब देखना यह है कि क्या रेगुलेटर इन PSL गाइडलाइन्स को लेकर कोई औपचारिक समीक्षा या चर्चा शुरू करता है। निवेशकों को इस पर नजर रखनी चाहिए कि क्या ऐसे बदलावों को अपनाने पर बैंकों की लोन बुक इंफ्रास्ट्रक्चर की ओर झुकती है और यह बदलाव बैंकिंग संस्थानों के ओवरऑल इंटरेस्ट मार्जिन और रिस्क प्रोफाइल को कैसे प्रभावित करता है।

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