रूस अब डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए अपने नए 'A7' पेमेंट सिस्टम और 'A7A5' स्टेबलकॉइन को प्रमोट कर रहा है। **$140 बिलियन** के टर्नओवर वाले इस प्रोजेक्ट का लक्ष्य एशिया और अफ्रीका जैसे देशों को जोड़ना है। भारतीय निवेशकों को यह समझने की जरूरत है कि यह नया फाइनेंशियल सिस्टम अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भारतीय ऊर्जा आयात को कैसे प्रभावित कर सकता है।
रूस एक ऐसा स्वतंत्र फाइनेंशियल इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर रहा है जो अंतरराष्ट्रीय ट्रेड के लिए अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम कर सके। इस मुहिम के केंद्र में 'A7' पेमेंट सिस्टम और 'A7A5' स्टेबलकॉइन है, जिसे रशियन रूबल से जोड़ा गया है। इसका उद्देश्य ग्लोबल साउथ (Global South) के देशों को एक ऐसा न्यूट्रल प्लेटफॉर्म देना है, जो पारंपरिक SWIFT बैंकिंग सिस्टम का विकल्प बन सके।
आंकड़ों का गणित
इस पहल के तहत अब तक $140 बिलियन का टर्नओवर दर्ज किया गया है। हालांकि यह आंकड़ा ग्लोबल स्टेबलकॉइन मार्केट के मुकाबले छोटा है, लेकिन रूस इसे एक सस्ता विकल्प बनाने की कोशिश कर रहा है। इसमें 0.3% कमीशन और वैट (VAT) का चार्ज लगता है।
भारतीय निवेशकों के लिए चेतावनी
भारत फिलहाल रूस के साथ व्यापार के लिए स्पेशल रुपी वोस्ट्रो अकाउंट (SRVA) सिस्टम का उपयोग कर रहा है। नया रूसी पेमेंट सिस्टम व्यापार के लिए नया रास्ता तो खोल सकता है, लेकिन इसके साथ 'सेकेंडरी सैंक्शंस' का गंभीर जोखिम भी जुड़ा है। पश्चिमी देशों के कंट्रोल से बचने वाले किसी भी सिस्टम पर इंटरनेशनल रेगुलेटर्स और Financial Action Task Force (FATF) की पैनी नजर हो सकती है।
इसके अलावा, रूबल-पेग्ड डिजिटल एसेट की लिक्विडिटी (Liquidity), यूएस डॉलर या USDT के मुकाबले काफी कम है। इससे बिजनेस के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे अपनाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। फिलहाल, निवेशकों को यह देखना होगा कि क्या अन्य केंद्रीय बैंक इसे स्वीकार करते हैं या वे अपने द्विपक्षीय सेटलमेंट सिस्टम (जैसे भारत-रूस रुपी मैकेनिज्म) पर ही भरोसा बनाए रखते हैं।
