US से आ रहे नरम आर्थिक आंकड़ों के चलते अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा सितंबर में रेट हाइक की संभावना कम हो गई है, जिससे भारतीय रुपये को सहारा मिल रहा है। हालांकि, घरेलू मोर्चे पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के सामने **₹9.71 लाख करोड़** की रिकॉर्ड लिक्विडिटी सरप्लस को मैनेज करने की बड़ी चुनौती है।
भारतीय रुपये के लिए सेंटिमेंट में सुधार दिख रहा है क्योंकि ग्लोबल मार्केट में सितंबर में US फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की उम्मीदें ठंडी पड़ गई हैं। रेट हाइक की संभावना अब गिरकर लगभग 50% पर आ गई है, जो एक हफ्ते पहले के मुकाबले काफी कम है। फेड गवर्नर क्रिस्टोफर वॉलर की नरम टिप्पणियों और US के कमजोर जॉब्स डेटा ने यह संकेत दिया है कि वहां की इकोनॉमी उम्मीद से ज्यादा तेजी से कूल हो रही है। फिलहाल USD/INR 94.41 से 94.59 की रेंज में ट्रेड कर रहा है।
लिक्विडिटी का डबल-एज्ड स्वॉर्ड
घरेलू वित्तीय प्रणाली में 2 सितंबर 2026 तक ₹9.71 लाख करोड़ की रिकॉर्ड लिक्विडिटी का सरप्लस दर्ज किया गया है। इस अतिरिक्त नकदी का एक बड़ा हिस्सा FCNR(B) डिपॉजिट स्कीम से आया है, जिसने $136 बिलियन से अधिक की राशि जुटाई है। बैंकिंग सिस्टम के लिए यह पैसा एक दोधारी तलवार की तरह है।
RBI का लिक्विडिटी मैनेजमेंट
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता यह है कि यह अतिरिक्त नकदी मनी मार्केट को खराब न करे। सिस्टम में ज्यादा पैसा होने से शॉर्ट-टर्म ब्याज दरों में गिरावट आ सकती है और महंगाई बढ़ सकती है। इसे कंट्रोल करने के लिए RBI लगातार Variable Rate Reverse Repo (VRRR) ऑक्शन का सहारा ले रहा है। मार्केट की नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या RBI आने वाले समय में ओपन मार्केट ऑपरेशंस (OMO) या कैश रिजर्व रेशियो (CRR) में बदलाव जैसे बड़े कदम उठाएगा।
निवेश पर क्या असर?
रुपया अभी स्थिर दिख रहा है, लेकिन ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतों में उतार-चढ़ाव भारतीय करेंसी के लिए एक बड़ा रिस्क है। तेल की कीमतें बढ़ने से भारत का ट्रेड डेफिसिट बढ़ सकता है। निवेशकों को US के आगामी नॉन-फार्म पेरोल डेटा पर बारीक नजर रखनी चाहिए, जो फेड के अगले कदम की दिशा तय करेगा।
