Rupee Hedging: RBI की सख्ती के बाद रुपी Hedging का खर्च कई साल के उच्चतम स्तर पर

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AuthorMehul Desai|Published at:
Rupee Hedging: RBI की सख्ती के बाद रुपी Hedging का खर्च कई साल के उच्चतम स्तर पर

RBI के लिक्विडिटी उपायों के कारण इंडियन रुपी की Hedging कॉस्ट साल 2022 के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है। डॉलर के मुकाबले जोखिम कम करने का यह महंगा सौदा कंपनियों के मुनाफे पर असर डाल सकता है।

भारतीय कंपनियों और बैंकों के लिए करेंसी में उतार-चढ़ाव से बचाव (Hedging) करना अब काफी महंगा हो गया है। Hedging एक तरह से उन कारोबारियों के लिए 'इंश्योरेंस' है जो विदेशी मुद्रा में व्यापार करते हैं, ताकि वे एक तय एक्सचेंज रेट पर फ्यूचर पेमेंट को लॉक कर सकें। इस हफ्ते, एक साल के लिए रुपी को डॉलर के मुकाबले हेज करने की लागत 4.6% के पार चली गई है, जो जनवरी 2022 के बाद का उच्चतम स्तर है।\n\n### RBI के लिक्विडिटी उपायों का असर\n\nयह उछाल रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा लिक्विडिटी मैनेज करने के फैसलों से जुड़ा है। रुपी की स्पॉट प्राइस को 95 के स्तर के आसपास बनाए रखने के लिए सेंट्रल बैंक ने मार्केट में डॉलर की बिक्री और खरीद के स्वैप ऑपरेशन किए हैं। इस वजह से स्वैप मार्केट में नकदी यानी लिक्विडिटी कम हो गई है। जब लिक्विडिटी टाइट होती है, तो करेंसी स्वैप का ट्रेड करना काफी महंगा हो जाता है।\n\nमार्केट डेटा के अनुसार, 3-महीने की Hedging कॉस्ट 7.2% तक पहुंच गई है, जो कि भारत और अमेरिका के बीच ब्याज दरों के अंतर के मुकाबले काफी ज्यादा है। इसके अलावा, बैंकों के लिए ओवरनाइट फंडिंग कॉस्ट भी बढ़कर 2 पैसे तक पहुंच गई है, जो कि पहले के मुकाबले 4 गुना है।\n\n### कंपनियों और निवेशकों के लिए क्या मायने हैं?\n\nनिवेशकों के लिए चिंता की बात यह है कि इसका असर कंपनियों की बैलेंस शीट पर पड़ेगा। ऊर्जा (Energy), इलेक्ट्रॉनिक्स और केमिकल सेक्टर की कंपनियां जो बड़ी मात्रा में आयात (Import) करती हैं, वे आमतौर पर अपने खर्च को कंट्रोल करने के लिए हेजिंग का इस्तेमाल करती हैं। जब हेजिंग महंगी होती है, तो इन कंपनियों का ऑपरेशनल खर्च सीधे तौर पर बढ़ जाता है। अगर यह स्थिति बनी रहती है, तो कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है, खासकर उन कंपनियों के लिए जो ग्राहकों पर तुरंत लागत का बोझ नहीं डाल सकतीं।\n\nइसके अलावा, जिन कंपनियों पर डॉलर में भारी कर्ज यानी External Commercial Borrowings (ECB) है, उन्हें अब भविष्य में रुपी की गिरावट से बचने के लिए ज्यादा प्रीमियम देना होगा। अगर कोई कंपनी यह भारी प्रीमियम नहीं चुका सकती, तो वह 'अनहेज्ड' रहने का जोखिम लेगी, जो करेंसी में उतार-चढ़ाव के दौरान कंपनी के लिए खतरनाक हो सकता है।\n\n### आगे की राह\n\nबैंक, जो इस मार्केट के मुख्य खिलाड़ी हैं, वे भी इस अस्थिरता के बीच अपनी पोजीशन मैनेज करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मार्केट की बदलती कीमतों के कारण कई बैंकों को अपने करेंसी पोर्टफोलियो पर नुकसान की रिपोर्ट दी गई है। आने वाली तिमाही नतीजों (Quarterly Results) में निवेशकों को मैनेजमेंट की कमेंट्री पर नजर रखनी चाहिए कि कंपनियां किस तरह अपने फाइनेंस कॉस्ट और करेंसी घाटे को मैनेज कर रही हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.