भारतीय रुपये के फॉरवर्ड प्रीमियम में **50-पैसे** के हालिया उछाल के बाद अब कुछ राहत दिखी है। हालांकि, रुपया अभी भी दबाव में है और **9 अक्टूबर, 2026** को यह **96.65 से 96.98** प्रति डॉलर के आसपास कारोबार कर रहा है।
प्रीमियम में राहत, लेकिन कमजोरी बरकरार
रुपये के फॉरवर्ड प्रीमियम—जो भविष्य में करेंसी रिस्क को कम करने की लागत तय करता है—में 8 अक्टूबर को आए 50-पैसे के भारी उछाल के बाद अब थोड़ी नरमी देखने को मिली है। यह उन कंपनियों के लिए राहत की बात है जो डोमेस्टिक मार्केट में अपना रिस्क हेज (hedge) करती हैं। हालांकि, प्रीमियम का गिरना यह नहीं बताता कि रुपये की मजबूती लौट आई है। मुद्रा अभी भी 96.65 से 96.98 डॉलर के दायरे में तनावपूर्ण स्थिति में बनी हुई है।
RBI की लिक्विडिटी और बाजार का हाल
इस उतार-चढ़ाव की बड़ी वजह RBI का लिक्विडिटी मैनेजमेंट है। 7 अक्टूबर, 2026 को रेपो रेट को 25 बेसिस पॉइंट्स बढ़ाकर 5.50% करने और 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' की नीति अपनाने के बाद बाजार के समीकरण बदल गए हैं। RBI लिक्विडिटी कंट्रोल करने के लिए 'सेल/बाय' फॉरेक्स स्वैप का इस्तेमाल कर रहा है, जिससे प्रीमियम में अस्थायी तेजी आई थी।
FII आउटफ्लो और क्रूड का डबल अटैक
ऑफशोर (NDF) मार्केट में डॉलर की डिमांड अभी भी काफी ज्यादा बनी हुई है। इसकी सबसे बड़ी वजह FII का लगातार बिकवाली करना है। 2026 में अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से ₹2.5 लाख करोड़ से ज्यादा की निकासी कर ली है। इसके अलावा, ब्रेंट क्रूड ऑयल का भाव $100 प्रति बैरल के पार बना रहना रुपये के लिए चिंता का विषय है। भारत की तेल जरूरतों को देखते हुए, डॉलर की मांग बनी रहती है जो रुपये को कमजोर करती है।
इंपोर्ट करने वाली कंपनियां जैसे ऑयल मार्केटिंग फर्म्स और एयरलाइंस के मार्जिन पर बुरा असर पड़ने की आशंका है। हालांकि, फार्मा और आईटी जैसे एक्सपोर्ट सेक्टर को कमजोरी से थोड़ा फायदा मिल सकता है, लेकिन ग्लोबल मार्केट का सेंटीमेंट अभी भी काफी सतर्क बना हुआ है।
