भारत में रिटेल कर्ज बढ़कर जीडीपी (GDP) का **45.5%** हो गया है, जिससे फाइनेंशियल स्टेबिलिटी पर सवाल उठ रहे हैं। बैंकों की एसेट क्वालिटी **1.8%** GNPA के साथ सुरक्षित है, लेकिन मॉनसून में **13%** की कमी के चलते Bajaj Finance और Piramal Finance जैसे कर्जदाताओं के गोल्ड लोन पोर्टफोलियो में दबाव दिख रहा है।
भारतीय बैंकिंग सेक्टर 2026 की दूसरी छमाही में एक दोहरे दौर से गुजर रहा है। एक तरफ, मार्च 2026 तक सकल गैर-निष्पादित संपत्ति (GNPA) 1.8% के निचले स्तर पर है, जो मजबूत कैपिटल बफर को दर्शाता है। लेकिन, दूसरी तरफ Household Sector में बढ़ता कर्ज चिंता का विषय बना हुआ है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की रिपोर्ट के मुताबिक, रिटेल कर्ज जीडीपी के 45.5% तक पहुंच चुका है, जिसमें नॉन-हाउसिंग लोन का हिस्सा सबसे अधिक है।
रिटेल क्रेडिट की बढ़ती चुनौती
सितंबर 2026 तक बैंकिंग सेक्टर में क्रेडिट ग्रोथ 19.1% रही है, लेकिन समस्या यह है कि यह ग्रोथ निवेश के बजाय खपत (consumption) के लिए ली जा रही है। इसका मतलब है कि लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए कर्ज पर निर्भर हैं, जिससे वे आर्थिक झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील हो गए हैं।
ग्रामीण इलाकों में तनाव के संकेत
इस साल दक्षिण-पश्चिम मॉनसून में 13% की कमी दर्ज की गई है, जिसका सीधा असर ग्रामीण आय पर पड़ा है। ग्रामीण इलाकों में नकदी प्रवाह चक्रीय (cyclical) होता है, और बारिश की कमी के कारण अब लोन चुकाने की क्षमता प्रभावित हो रही है।
Bajaj Finance और Piramal Finance जैसी प्रमुख NBFCs ने अपने गोल्ड लोन पोर्टफोलियो में शुरुआती दबाव की बात स्वीकारी है। इस रिस्क को देखते हुए, कंपनियों ने अब अपने अंडरराइटिंग स्टैंडर्ड्स कड़े कर दिए हैं, सूखे से प्रभावित क्षेत्रों में लोन देना कम कर दिया है और कुछ हाई-रिस्क वाले शॉर्ट-टर्म प्रोडक्ट्स को बंद करना शुरू कर दिया है। निवेशकों के लिए अब केवल क्रेडिट ग्रोथ ही नहीं, बल्कि कंपनियों की एसेट क्वालिटी पर नजर रखना बहुत जरूरी हो गया है, क्योंकि आने वाले क्वार्टरली नतीजे यह साफ करेंगे कि यह तनाव कितना गहरा है।
