F&O की बढ़ती मुश्किलों से परेशान रिटेल निवेशक, अब Margin Trading की तरफ बढ़ा रहे कदम

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AuthorAditya Rao|Published at:
F&O की बढ़ती मुश्किलों से परेशान रिटेल निवेशक, अब Margin Trading की तरफ बढ़ा रहे कदम

F&O ट्रेडिंग में बढ़ रहे खर्चों और सख्त नियमों से तंग आकर निवेशक अब मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी (MTF) का रुख कर रहे हैं। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर MTF का कुल बुक साइज सितंबर में **52%** बढ़कर **₹1.51 लाख करोड़** के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, जिससे ब्रोकरेज कंपनियों की कमाई का जरिया भी बदल रहा है।

भारत में रिटेल निवेशक अब बाजार में पैसा लगाने का तरीका बदल रहे हैं। इंडेक्स और स्टॉक फ्यूचर्स के मुकाबले मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी (MTF) निवेशकों की पहली पसंद बनती जा रही है। जहां फ्यूचर्स का इस्तेमाल प्राइस मूवमेंट पर दांव लगाने के लिए किया जाता है, वहीं MTF के जरिए निवेशक ब्रोकर से पैसा उधार लेकर डिलीवरी में शेयर खरीद सकते हैं।

निवेशक क्यों बदल रहे हैं रुख?

रेगुलेटरी बदलावों के कारण अब डेरिवेटिव ट्रेडिंग पहले से कहीं ज्यादा महंगी और जटिल हो गई है। वीकली एक्सपायरी के नए नियमों और ट्रांजैक्शन टैक्स में बढ़ोतरी के बाद फ्यूचर्स ट्रेडिंग का आकर्षण कम हुआ है। इसी का नतीजा है कि सितंबर महीने में इंडेक्स फ्यूचर्स का एवरेज डेली टर्नओवर सालाना आधार पर 30% गिरकर ₹15,578 करोड़ रह गया है।

ब्रोकरेज कंपनियों का बदलता रेवेन्यू मॉडल

इस बदलाव ने Angel One, Groww और HDFC Securities जैसी बड़ी ब्रोकरेज कंपनियों के लिए कमाई का नया और स्थिर रास्ता खोल दिया है। मार्केट में उतार-चढ़ाव के दौरान ट्रांजैक्शन-बेस्ड इनकम कम हो सकती है, लेकिन MTF से मिलने वाला ब्याज एक मजबूत सपोर्ट देता है। उदाहरण के लिए, सितंबर तिमाही में Angel One के कुल रेवेन्यू का 36% हिस्सा ब्याज से आया, जबकि Groww के लिए यह आंकड़ा 10.1% रहा।

मार्जिन ट्रेडिंग के छिपे जोखिम

मार्जिन ट्रेडिंग में सहूलियत तो है, लेकिन इसमें जोखिम भी कम नहीं है। ब्रोकर आमतौर पर 9% से 14% तक ब्याज वसूलते हैं, जबकि वे खुद कमर्शियल पेपर के जरिए 7% से 7.5% पर फंड जुटाते हैं।

निवेशक को ट्रेड वैल्यू का करीब 30% से 40% मार्जिन खुद देना होता है। अगर शेयर की कीमत गिरती है, तो गिरवी रखे गए शेयरों की वैल्यू कम हो जाती है। ऐसे में ब्रोकर 'मार्जिन कॉल' जारी करते हैं और तुरंत और पैसा जमा करने को कहते हैं। अगर निवेशक समय पर फंड नहीं डाल पाता है, तो ब्रोकर नुकसान की भरपाई के लिए शेयर बेचने का अधिकार रखते हैं। यह लिक्विडेशन प्रक्रिया ब्रोकर को तो सुरक्षित रखती है, लेकिन निवेशक के लिए यह बड़ा नुकसान साबित हो सकती है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.