Reliance Communications के रेजोल्यूशन प्रोफेशनल ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ क्यूरेटिव पिटीशन दायर की है, जिसमें टेलिकॉम स्पेक्ट्रम को इनसॉल्वेंसी एसेट से बाहर रखा गया था।
कानूनी लड़ाई का नया मोड़
Reliance Communications (RCom) ने अपनी बची हुई संपत्तियों को बचाने के लिए कानूनी रास्ता अख्तियार किया है। कंपनी ने 13 फरवरी 2026 के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ क्यूरेटिव पिटीशन दायर की है, जिसमें कहा गया था कि टेलिकॉम स्पेक्ट्रम को 'इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड' (IBC) के तहत संपत्ति नहीं माना जा सकता। इस फैसले से लेंडर्स की रिकवरी प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित हुई है।
DoT के एक्शन से लेंडर्स को झटका
विवाद तब गहरा गया जब Department of Telecommunications (DoT) ने RCom और उसकी सब्सिडियरी Reliance Telecom Limited के स्पेक्ट्रम लाइसेंस रद्द कर दिए और बैंक गारंटी भुना ली। इससे लेंडर्स की संपत्ति का दायरा सिमट गया है। सरकार की ओर से कुल क्लेम लगभग ₹31,276 करोड़ का है, जो यह दर्शाता है कि कॉर्पोरेट इनसॉल्वेंसी में सरकारी बकाया को किस तरह प्राथमिकता दी जा रही है।
अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा रिस्क?
याचिका में चेतावनी दी गई है कि अगर स्पेक्ट्रम जैसी सरकारी रियायतों को इनसॉल्वेंसी दायरे से बाहर रखा जाता है, तो यह माइनिंग, ऑयल एंड गैस और हाइड्रोपावर जैसे अन्य सेक्टर्स के लिए भी बड़ा रिस्क बन सकता है। इससे इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों को कर्ज मिलने में मुश्किल आ सकती है।
IBC के नियम और उम्मीदें
कंपनी का तर्क है कि IBC की धारा 14(1) के तहत इनसॉल्वेंसी के दौरान लाइसेंस रद्द नहीं किए जा सकते, बशर्ते भुगतान समय पर हो। RCom का कहना है कि उसने शर्तों का पालन किया था, इसलिए सरकार का कदम गलत है। अब कोर्ट का रुख यह तय करेगा कि लेंडर्स की रिकवरी का क्या होगा और भविष्य में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की फंडिंग कैसे प्रभावित होगी।
