REITs vs InvITs: कमाई के लिए बेहतरीन विकल्प, जानें क्या हैं इनके रिस्क और फायदे

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AuthorMehul Desai|Published at:
REITs vs InvITs: कमाई के लिए बेहतरीन विकल्प, जानें क्या हैं इनके रिस्क और फायदे

REITs और InvITs निवेशकों को रेगुलर इनकम का जरिया देते हैं। ये एसेट्स स्टॉक्स से अलग हैं क्योंकि इन्हें कानूनन अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा निवेशकों को बांटना पड़ता है।

REITs (Real Estate Investment Trusts) और InvITs (Infrastructure Investment Trusts) हाइब्रिड फाइनेंशियल व्हीकल्स की तरह काम करते हैं। ये आम निवेशकों को बड़े कमर्शियल प्रॉपर्टी और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में पैसा लगाने का मौका देते हैं। ये ट्रस्ट एक ब्रिज की तरह काम करते हैं जो एसेट ऑपरेटर्स और निवेशकों को जोड़ते हैं। ये कंपनियां स्पेशल पर्पस व्हीकल्स (SPVs) के जरिए ऑफिस पार्क, टोल रोड और पावर ट्रांसमिशन जैसी संपत्तियों का मालिकाना हक रखती हैं।

कमाई बांटने का अनिवार्य नियम

इन इंस्ट्रूमेंट्स की सबसे बड़ी खासियत इनका रेगुलेटरी स्ट्रक्चर है। मार्केट रेगुलेटर SEBI के नियमों के मुताबिक, इन ट्रस्ट्स को अपनी नेट डिस्ट्रीब्यूटेबल कैश फ्लो (NDCF) का कम से कम 90% हिस्सा निवेशकों को बांटना होता है। यह ऑर्डिनरी शेयर के डिविडेंड से बिल्कुल अलग और अधिक स्थिर होता है। हालांकि, ज्यादातर मुनाफा बांट देने के कारण इनकी ग्रोथ नए एसेट्स खरीदने पर निर्भर करती है।

ब्याज दरों का असर

ये ट्रस्ट्स आरबीआई (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं। जब मार्केट में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो निवेशक अधिक यील्ड (Yield) की उम्मीद करते हैं। ऐसे में अगर इन ट्रस्ट्स का रिटर्न नहीं बढ़ता, तो यूनिट की कीमतों में गिरावट आ सकती है। इसीलिए, इन्हें अक्सर बॉन्ड जैसा ही माना जाता है।

टैक्स का जटिल गणित

इनसे मिलने वाली कमाई को सिर्फ एक कैटेगरी में नहीं रखा जा सकता। इसमें इंटरेस्ट, रेंटल इनकम और डेट रीपेमेंट शामिल हो सकते हैं, जिन पर अलग-अलग तरह से टैक्स लगता है। सही पोस्ट-टैक्स रिटर्न समझने के लिए निवेशकों को ट्रस्ट द्वारा दिए गए टैक्स स्टेटमेंट को गौर से देखना चाहिए।

परफॉर्मेंस और रिस्क को कैसे मापें?

  • REITs के लिए: वैकेंसी रेट और रेंट बढ़ाने की क्षमता पर नजर रखें।
  • InvITs के लिए: टोल कलेक्शन और पावर ट्रांसमिशन जैसे लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स पर ध्यान दें।

निवेशकों को कंपनी का डेट-टू-इक्विटी रेशियो (Debt-to-Equity Ratio) भी जरूर देखना चाहिए, क्योंकि ज्यादा कर्ज ब्याज दरों के बढ़ने पर कैश फ्लो पर दबाव डाल सकता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.