RBI का बड़ा दांव: अब बैंकों को बांटनी होगी फ्रॉड की जिम्मेदारी, ई-कॉमर्स पर भी कसी नकेल

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AuthorMehul Desai|Published at:
RBI का बड़ा दांव: अब बैंकों को बांटनी होगी फ्रॉड की जिम्मेदारी, ई-कॉमर्स पर भी कसी नकेल
Overview

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 'पेमेंट्स विजन 2028' (Payments Vision 2028) का ऐलान किया है, जिसके तहत अब अनधिकृत (unauthorized) डिजिटल लेनदेन के मामले में जारी करने वाले (issuer) और पैसा पाने वाले (beneficiary) दोनों बैंकों को बराबर का जिम्मेदार ठहराया जाएगा। यह एक बड़ा रेगुलेटरी कदम है जो ग्राहकों के भरोसे को बढ़ाने और वित्तीय प्रणाली में सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से उठाया गया है।

फ्रॉड की आधी जिम्मेदारी अब बैंकों की, RBI का नया फरमान

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश के डिजिटल पेमेंट सेक्टर को नई दिशा देने के लिए 'पेमेंट्स विजन 2028' जारी किया है। इस विजन का मुख्य फोकस सिर्फ ग्रोथ नहीं, बल्कि डिजिटल लेन-देन में भरोसा, मजबूती और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंच बढ़ाना है। इस योजना का एक सबसे अहम हिस्सा अनधिकृत डिजिटल भुगतानों के लिए 'साझा जिम्मेदारी' का नया नियम है।

बैंकों पर पड़ेगा सीधा असर, घटेगा मुनाफा?

अब तक, अनधिकृत ट्रांजेक्शन की ज्यादातर जिम्मेदारी ग्राहक के बैंक की होती थी। लेकिन नए नियम के तहत, जिस बैंक से पैसा जा रहा है (issuer bank) और जिस बैंक में पैसा आ रहा है (beneficiary bank), दोनों ही बराबर के भागी होंगे। विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर फ्रॉड की घटनाएं इसी रफ्तार से जारी रहीं तो बड़े सरकारी बैंकों के नेट प्रॉफिट मार्जिन में 0.5% से लेकर 1.5% तक की कमी आ सकती है। ऐसे में, बैंकों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित फ्रॉड डिटेक्शन सिस्टम में निवेश बढ़ाना होगा। अनुमान है कि 2025 तक डिजिटल पेमेंट फ्रॉड $20 बिलियन के आंकड़े को पार कर सकता है।

फ्रॉड जोखिम और लागत का बंटवारा

फ्रॉड की जिम्मेदारी बंटने का मतलब है कि पेमेंट रिस्क से जुड़े कामों और खर्चों का बोझ अब दोनों बैंकों पर होगा। इससे पहले, ग्राहक को अपने पैसे वापस पाने के लिए लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था। लेकिन अब, पैसा पाने वाले बैंक की भी जिम्मेदारी तय होने से, दोनों बैंक मिलकर फ्रॉड को रोकने और उसका पता लगाने के लिए ज्यादा सक्रिय होंगे। इसके लिए बैंकों को अपने मॉनिटरिंग सिस्टम, कस्टमर सर्विस और डिस्प्यूट (विवाद) हैंडलिंग प्रक्रियाओं को अपग्रेड करना होगा, जिससे उनके ऑपरेटिंग खर्चे बढ़ सकते हैं।

ई-कॉमर्स पर सीधी नजर और आसान इंटरनेशनल पेमेंट

'पेमेंट्स विजन 2028' के तहत, RBI बड़े ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स और डिजिटल पेमेंट फ्लो के लिए अहम भूमिका निभाने वाले अन्य प्लेटफॉर्म्स पर भी सीधी निगरानी रखने की योजना बना रहा है। यह इस बात का संकेत है कि RBI इन प्लेटफॉर्म्स के बढ़ते महत्व को पहचानता है। इससे इन कंपनियों के लिए नए नियम और जटिल ऑपरेशन शुरू हो सकते हैं। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय पेमेंट्स को आसान बनाने पर भी जोर दिया गया है, जो पारंपरिक रूप से फिनटेक और एक्सपोर्टर्स के लिए महंगे और जटिल रहे हैं। एक 'सिंगल-विंडो' सिस्टम लाने का प्रस्ताव है, जिससे क्रॉस-बॉर्डर मनी ट्रांसफर शुरू से अंत तक सरल हो सके।

आगे की राह में चुनौतियां

हालांकि RBI की यह योजना ग्राहक सुरक्षा और इनोवेशन को बढ़ावा देने वाली है, लेकिन इसमें कुछ चुनौतियां भी हैं। साझा जिम्मेदारी का नियम ग्राहकों के लिए तो अच्छा है, लेकिन इससे बैंकों के बीच विवाद बढ़ सकते हैं और ऑपरेटिंग खर्चे में भी इजाफा हो सकता है। ई-कॉमर्स साइट्स और पेमेंट प्रोवाइडर्स के लिए RBI की सीधी निगरानी का मतलब है कि उन्हें ज्यादा कंप्लायंस सिस्टम बनाने होंगे, जो छोटे फर्म्स के लिए मुश्किल हो सकता है। एनालिस्ट्स का कहना है कि डिजिटल पेमेंट्स में भारी निवेश वाले बैंकों को ज्यादा सतर्क रहना होगा। पेटीएम पेमेंट्स बैंक जैसे पिछले मामलों से यह साफ हो जाता है कि रेगुलेटर्स गैर-कंप्लायंस पर कितनी तेजी से कार्रवाई कर सकते हैं।

भविष्य की ओर: इनोवेशन और रेगुलेशन का संतुलन

RBI का यह कदम भारत के तेजी से बढ़ते डिजिटल पेमेंट सेक्टर में इनोवेशन और कड़े रेगुलेशन के बीच संतुलन बनाने का एक सोच-समझकर किया गया प्रयास है। भारत का लक्ष्य रियल-टाइम डिजिटल पेमेंट्स में वैश्विक लीडर बने रहना है। 'पेमेंट्स विजन 2028' की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह कितना प्रभावी ढंग से लागू होता है और उद्योग नई फ्रॉड नीतियों और बढ़ी हुई कंप्लायंस जरूरतों के अनुकूल कैसे ढलता है। डिजिटल पेमेंट्स के 2026 तक $10 ट्रिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है।

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