RBI का बड़ा ऐलान! छोटे डिजिटल फ्रॉड पर पाएं ₹25,000 तक का मुआवजा, देखें क्या हैं नियम

BANKINGFINANCE
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AuthorNeha Patil|Published at:
RBI का बड़ा ऐलान! छोटे डिजिटल फ्रॉड पर पाएं ₹25,000 तक का मुआवजा, देखें क्या हैं नियम
Overview

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने छोटे डिजिटल फ्रॉड (Digital Fraud) के पीड़ितों को राहत देने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। नए नियमों के तहत, अब ऐसे मामलों में **₹25,000** तक का मुआवजा मिल सकता है, जो ग्राहक को एक बार दिया जाएगा।

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RBI का उपभोक्ताओं को तोहफा: कैसे काम करेगा नया नियम?

RBI के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने 6 फरवरी, 2026 को इस नई पहल का ऐलान किया। इस कदम का मुख्य मकसद भारत की तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था में आम आदमी का भरोसा और बढ़ाना है। RBI की ओर से पेश किए गए इस फ्रेमवर्क के अनुसार, धोखाधड़ी के शिकार व्यक्ति को उसके कुल नुकसान का 85% या अधिकतम ₹25,000 (जो भी कम हो) मुआवजा मिलेगा। यह सुविधा ग्राहक को 'वन्स-इन-ए-लाइफटाइम' (once-in-a-lifetime) यानी केवल एक बार ही मिलेगी।

कब और कितना मिलेगा मुआवजा?

उदाहरण के तौर पर, अगर किसी व्यक्ति को डिजिटल फ्रॉड में ₹50,000 का नुकसान हुआ है, तो उसे ₹25,000 का मुआवजा दिया जाएगा। वहीं, अगर नुकसान ₹20,000 का है, तो उसे नुकसान की 85% राशि, यानी ₹17,000 का भुगतान किया जाएगा। यह नियम छोटे नुकसानों पर तत्काल राहत देने के लिए बनाया गया है।

फ्रॉड का बढ़ता ग्राफ और RBI की चिंता

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यह नया मुआवजा ढांचा छोटे नुकसानों को कवर करता है। दूसरी ओर, भारतीय बैंकिंग सेक्टर में कुल धोखाधड़ी की रकम में भारी उछाल देखा गया है। RBI के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) 2023-24 में जहां धोखाधड़ी के कुल ₹11,261 करोड़ के मामले सामने आए थे, वहीं 2024-25 में यह आंकड़ा बढ़कर ₹34,771 करोड़ तक पहुंच गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि बड़े वित्तीय घोटालों का खतरा अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

डिजिटल सुरक्षा के लिए बहु-आयामी रणनीति

RBI केवल मुआवजे तक ही सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम को और मजबूत करने के लिए कई अन्य कदम भी उठा रही है। जल्द ही वित्तीय उत्पादों की गलत बिक्री (mis-selling), लोन रिकवरी (loan recovery) एजेंटों के व्यवहार और अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन में ग्राहकों की देनदारी को लेकर नए ड्राफ्ट नियम जारी किए जाएंगे। इसके अतिरिक्त, सीनियर सिटीजन्स (senior citizens) और अन्य कमजोर समूहों को साइबर हमलों से बचाने के लिए 'लैग्ड क्रेडिट्स' (lagged credits) और उन्नत ऑथेंटिकेशन (enhanced authentication) जैसे उपायों पर भी विचार-विमर्श चल रहा है।

ग्लोबल ट्रेंड और भारत का फोकस

दुनिया भर के रेगुलेटर (regulators) भी डिजिटल फ्रॉड से निपटने के लिए नई रणनीतियां अपना रहे हैं। यूनाइटेड किंगडम (UK) में अधिकृत पुश पेमेंट (APP) फ्रॉड के लिए £85,000 तक का अनिवार्य रीइम्बर्समेंट (reimbursement) स्कीम है। वहीं, सिंगापुर (Singapore) और ऑस्ट्रेलिया (Australia) जैसे देश बैंकों, फिनटेक (fintech) फर्मों और अन्य संस्थाओं के बीच साझा जिम्मेदारी (shared responsibility) पर जोर दे रहे हैं। भारत में, 2024 में ही साइबर क्राइम (cybercrime) से लगभग ₹22,845.73 करोड़ का नुकसान हुआ है, जिसमें प्लेटफॉर्म फ्रॉड (platform fraud) के मामले सबसे अधिक ( 57% ) रहे हैं।

आगे का रास्ता: भरोसेमंद डिजिटल भविष्य

RBI की इस पहल को डिजिटल फाइनेंस सेक्टर में उपभोक्ताओं का विश्वास बढ़ाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि RBI का 'जीरो-ट्रस्ट आर्किटेक्चर' (zero-trust architecture) और जोखिम-आधारित ऑथेंटिकेशन (risk-based authentication) जैसे ग्लोबल बेस्ट प्रैक्टिस (global best practices) को अपनाना सही दिशा में एक कदम है। हालांकि, फ्रॉड करने वाले लगातार अपनी चालें बदल रहे हैं, इसलिए यह एक निरंतर चलने वाली लड़ाई है। भविष्य में, RBI का ध्यान केवल नुकसान की भरपाई करने के बजाय, धोखाधड़ी को पहले से रोकने और एक सुरक्षित डिजिटल वित्तीय प्रणाली बनाने पर अधिक रहेगा, जिसमें सभी हितधारकों की सक्रिय भागीदारी जरूरी होगी।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.