RBI का बड़ा ऐलान, पर उम्मीदों से कम?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने केंद्र सरकार को वित्त वर्ष 2026 के लिए ₹2.87 लाख करोड़ का डिविडेंड (Dividend) ट्रांसफर करने को मंजूरी दे दी है। यह राशि रिकॉर्ड है और सरकार के लिए एक बड़ी वित्तीय राहत है। हालांकि, यह सरकार के ₹3.16 लाख करोड़ के बजट लक्ष्य से कम है।
वित्तीय प्रबंधन पर बढ़ता दबाव
इस कमी की वजह से सरकार के लिए अपने वित्तीय घाटे (Fiscal Deficit) को नियंत्रित करना और सब्सिडी जैसी ज़रूरी चीजों पर बढ़ते खर्च को पूरा करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। पश्चिमी एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के चलते तेल और उर्वरकों की वैश्विक कीमतों में भारी उछाल इन दबावों को और बढ़ा रहा है। सरकार पहले ही बढ़ते कच्चे तेल की लागत के नुकसान की भरपाई के लिए ईंधन की कीमतों में बदलाव कर चुकी है, जो उसकी वित्तीय नाजुकता को दर्शाता है।
RBI का मजबूत प्रदर्शन
सरकारी दबावों के बावजूद, RBI ने वित्त वर्ष 2026 के लिए एक मजबूत वित्तीय प्रदर्शन दर्ज किया है। जोखिम प्रावधानों से पहले, बैंक की सकल आय में साल-दर-साल 26.42% की वृद्धि हुई और यह ₹3,95,972.10 करोड़ तक पहुंच गई। सेंट्रल बैंक ने ₹1,09,379.64 करोड़ का कंटिंजेंसी रिस्क बफर (Contingency Risk Buffer) भी बनाए रखा, जो उसके बैलेंस शीट का 6.5% है। बैंक की बैलेंस शीट 20.61% बढ़कर ₹91.97 लाख करोड़ हो गई।
आगे की राह और चुनौतियां
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि उम्मीद से कम डिविडेंड सरकार के वित्तीय विकल्पों को सीमित कर सकता है। कोटक महिंद्रा बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री उपासना भारद्वाज के अनुसार, तत्काल उधार लेने की ज़रूरत शायद न बढ़े, लेकिन सब्सिडी खर्च और टैक्स रेवेन्यू की बारीकी से निगरानी करना महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल, 13 महीने के उच्चतम स्तर पर चल रही महंगाई एक बड़ी चिंता बनी हुई है।
कुछ विश्लेषकों का सुझाव है कि RBI जून 2026 में अपनी अगली बैठक में महंगाई को काबू करने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है, जिसका असर आर्थिक विकास पर पड़ सकता है। सरकार का इस तरह के डिविडेंड पर निर्भर रहना, राजस्व विविधीकरण में संभावित कमजोरियों की ओर इशारा करता है। बढ़ती वैश्विक कमोडिटी कीमतें और भू-राजनीतिक अस्थिरता एक अस्थिर माहौल बना रही है। किसी भी बड़े घटनाक्रम से सरकार को और अधिक खर्च या सब्सिडी में कटौती करनी पड़ सकती है, जिसके गंभीर आर्थिक और सामाजिक परिणाम हो सकते हैं। ब्याज दरों में बढ़ोतरी, जो महंगाई नियंत्रण के लिए ज़रूरी है, निवेश और उपभोक्ता खर्च को भी धीमा कर सकती है, जिससे आर्थिक अनिश्चितता बढ़ेगी। हाल ही में ईंधन की कीमतों में हुई बढ़ोतरी, जिसका मकसद नुकसान की भरपाई करना था, महंगाई को और भड़का सकती है।
